Saturday, 10 February 2018

UPPCS AO-RO Pre Exam General Hindi (2016) Solved

UPPCS AO-RO Pre Exam 2016
General Hindi (सामान्‍य हिन्‍दी)
1. ‘सुलभ’ का उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द है
(अ) दुष्‍प्राप्‍य
(ब) अलब्‍ध
(स) अप्राप्‍य
(द) दुर्लभ
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या–दुष्‍प्राप्‍य अथवा अप्राप्‍य का विलोम शब्‍द प्राप्‍य है और ‘लब्‍ध’ का विपरीतार्थक शब्‍द ‘अलब्‍ध’ है।
2. ’दीर्घायु’ का विलोम होगा
(अ) चिरायु
(ब) अल्‍पायु
(स) नश्‍वर
(द) क्षणिक
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या – ‘दीर्घायु’ अथवा ‘चिरायु’ का विलोम शब्‍द ‘अल्‍पायु’ है जबकि ‘नश्‍वर’ का 'अनश्‍वर' अथवा ‘क्षणिक’ का विपरीतार्थक शब्‍द ‘शाश्‍वत’ है।
3. ‘व्‍यष्टि’ का विपरीतार्थक शब्‍द है
(अ) समास
(ब) समवेत
(स) समष्टि
(द) समस्‍त
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या –‘व्‍यष्टि’ का विपरीतार्थक शब्‍द ‘समष्टि’ है जबकि ‘समास’ का विलोम शब्‍द ‘व्‍यास’, ‘समवेत’ का विलोम शब्‍द ‘असमवेत’ होता है।
4. ‘उपमेय’ का सर्वथा उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द है
(अ) अनुपमेय
(ब) अतुलनीय
(स) अनुपम
(द) अनुपमित
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – उपमेय का विलोम उपमान भी होता है। अतुलनीय का तात्‍पर्य है जिसकी तुलना न की जा सके अबकि अनुपम का अर्थ है जिसकी कोई उपमा न हो।
5. ‘भूगोल’ का विपरीतार्थक शब्‍द है
(अ) इतिहास
(ब) अंतरिक्ष
(स) ध्रुवगोल
(द) खगोल
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – खगोल पृथ्वी और उसके वायुमण्डल के बाहर होने वाली घटनाओं का अवलोकन, विश्लेषण तथा उसकी व्याख्या।
भूगोल पृथ्वी के ऊपरी स्वरुप और उसके प्राकृतिक विभागों का ज्ञान/व्‍याख्‍या।
6. ‘सहयोगी’ का सर्वथा उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द है
(अ) प्रतियोगी
(ब) प्रतिद्वन्‍द्वी
(स) प्रतिरोधी
(द) प्रतिकूल
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या –‘सहयोगी’ का सर्वथा उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द ‘प्रतियोगी’ होता है जबकि ‘प्रतिकूल’ का विपरीतार्थक शब्‍द ‘अनुकूल’ होता है।
7. ‘जोड़’ का उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द है
(अ) गुणा
(ब) भाग
(स) घटाव
(द) बाकी
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – ‘जोड़’ का उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द ‘घटाव’ होता है जबकि ‘गुणा’ का विपरीतार्थक शब्‍द ‘भाग’ होता है।
8. ‘तृष्‍णा’ का उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द है
(अ) वितृष्‍णा
(ब) निस्‍पृह
(स) संतुष्टि
(द) वितृप्‍त
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – ‘तृष्‍णा’ का उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द ‘वितृष्‍णा’ है जबकि ‘संतुष्टि’ का विपरीतार्थक शब्‍द ‘असंतुष्टि’ है।
9. ‘निषिद्ध’ का सर्वथा उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द है
(अ) निश्चित
(ब) विहित
(स) उचित
(द) निर्मित
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या - ‘निषिद्ध’ का सर्वथा उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द ‘विहित’ है, जबकि ‘निश्चित’ का विलोम ‘अनिश्चित’ ‘उचित’ का विलोम ‘अनुचित’ और ‘निर्मित’ का विलोम ‘अनिर्मित’ होता है।
10. पर्यायवाची की दृष्टि से एक वर्ग शुद्ध है
(अ) सिंह, पंचानन, नाहर, मृगारि
(ब) सूर्य, रवि, दिनकर, तरणी
(स) अग्नि, पावक, अनल, पिशुन
(द) महेश, रमेश, भूतेश, सतीश
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – सिंह, केसरी, नाहर, वनराज, मृगेन्‍द्र, मृगारि, पंचानन और बबर शेर के पर्यायवाची शब्‍द है। रवि, दिनकर, दिवाकर सूर्य के पर्यायवाची है जबकि तरणी नौका का पर्यायवाची है। इसी प्रकार अग्नि, पावक और अनल आग के पर्यायवाची शब्‍द है।
11. निम्‍नलिखित में से ए‍क ‘पत्‍थर’ का पर्यायवाची नहीं है-
(अ) प्रस्‍तर
(ब) उपल
(स) पशम
(द) पाहन
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – पत्‍थर के पर्यायवाची शब्‍द है- प्रस्‍तर, उपल, पाहन, पाषाण, अश्‍म, और शिला।
12. एक ‘यमुना’ का पर्यायवाची नहीं है
(अ) रविजा
(ब) तनूजा
(स) सूर्यजा
(द) अर्कजा
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या – यमुना के पर्यायवाची रविजा, सूर्यजा, सूर्यसुता, अर्कजा, कृष्‍णा और कालिन्‍दी है जबकि तनूजा पुत्री का पर्यायवाची शब्‍द है।
13.निम्‍नलिखित शब्‍दों में से एक शब्‍द ‘शंकर’ का पर्यायवाची नहीं है-
(अ) ललाटाक्ष
(ब) गंगाधर
(स) त्रिलोचन
(द) शशधर
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – शंकर के पर्यायवाची शब्‍द ललाटाक्ष, गंगाधर, त्रिलोचन, महेश, शिव, महादेव, आदि है जबकि शशधर चन्‍द्रमा का पर्यायवाची शब्‍द है।
14. निम्‍नलिखित में से एक शब्‍द ‘आम’ का पर्यायवाची’ नहीं है-
(अ) अतिसौरभ
(ब) सहकार
(स) अंबु
(द) रसाल
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – अतिसौरभ, सहकार, रसाल, आम्र, फलश्रेष्‍ठ और अमृतफल आम के पर्यायवाची शब्‍द है जबकि अंबु जल पर्यायवाची शब्‍द है।
15. निम्‍नलिखित में से एक ‘विष्‍णु’ का पर्यायवाची शब्‍द नहीं है-
(अ) कमलेश
(ब) कमलाकान्‍त
(स) कमलापति
(द) कमलासन
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – कमलेश, कमलाकान्‍त, श्रीपति, लक्ष्मीपति, चक्रपाणि, जनार्दन, हरि और नारायण विष्‍णु के पर्यायवाची शब्‍द है। जबकि कमलासन, हरिप्रिया और कमला लक्ष्‍मी के पर्यायवाची शब्‍द है।
16. निम्‍नलिखित में से एक ‘स्‍वर्ण’ का पर्यायवाची शब्‍द नहीं है-
(अ) हेम
(ब) हाटक
(स) हिरण्‍य
(द) कलधौत
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – कंचन, कनक, सोना, हेम, हाटक, हिरण्‍य, स्‍वर्ण के पर्यायवाची शब्‍द है। जबकि कलधौत, चांदी का पर्यायवाची है।
17. पर्यायवाची की दृष्टि से एक वर्ग शुद्ध है
(अ) इन्‍द्र, सतीश, सहस्‍त्राक्ष, मघवा
(ब) घर, निकेतन, आयतन, निलय
(स) यमुना, कालिन्‍दी, भनुतनया, जाह्नवी
(द) वस्‍त्र, पाटक, अम्‍बर, चीर
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या – घर, निकेतर, आयतन, निलय, गृह के पर्यायवाची है। मधवा और सहस्‍त्राक्ष इन्‍द्र के पर्यायवाची है। कालिन्‍दी और भनुतनया यमुना के पर्यायवाची है जबकि जाह्नवी  गंगा का पर्यायवाची है। इसी प्रकार पाटक व चीर वस्‍त्र के पर्याय हैं जबकि अम्‍बर आकाश का पर्यायवाची है।
18. निम्‍निलिखत में से एक ‘समुद्र’ का पर्यायवाची शब्‍द नहीं है-
(अ) जलधि
(ब) जलधाम
(स) जलनिधि
(द) जलाधिप
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – जलधि, जलधाम, जलनिधि और सागर समुद्र के पर्यायवाची शब्‍द हे जबकि जलाधिप वैदिक देवता वरूण का पर्यायवाची शब्‍द है।
19. निम्‍नलिखित में से एक ‘नदी’ का पर्यायवाची’ शब्‍द नहीं है-
(अ) निम्‍नगा
(ब) त्रिपथगा
(स) कूलंकषा
(द) कूलवती
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या – निम्‍नगा, कूलंकषा, सरिता, नदिया, तटिया, तरनी, अपगा, लहरी और पयस्विनी नदी के पर्यायवाची शब्‍द है जबकि त्रिपथगा गंगा का पर्यायवाची शब्‍द है।
20.एक की वर्तनी शुद्ध है
(अ) खिवैया
(ब) न्‍यौछावर
(स) अनन्‍नास
(द) निर्पेक्ष
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – अनन्‍नास की वर्तनी शुद्ध है। शेष निम्‍नवत है-
            शुद्ध              अशुद्ध
            खेवैया             खिवैया
            न्‍योछावर           न्‍यौछावर
            निरपेक्ष                  निर्पेक्ष
21. एक की वर्तनी शुद्ध है
(अ) षट्दर्शन
(ब) अनापेक्षित
(स) किलिष्‍ट
(द) पर्यवसान
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – पर्यवसान की वतनी शुद्ध है। शेष निम्‍नवत है-
शुद्ध              अशुद्ध
            षडदर्शन            षट्दर्शन
            अनपेक्षित          अनापेक्षित
            क्लिष्‍ट             किलिष्‍ट
22. ‘पोषक’ का उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द होगा
(अ) चूषण
(ब) अनपोषक
(स) शोषक
(द) क्षीणकारी
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – ‘पोषक’ का उपयुक्‍त विपरीतार्थक शब्‍द ‘शोषक’ होता है।
23. एक की वर्तनी शुद्ध है
(अ) उनन्‍यन
(ब) उन्‍नयन
(स) उन्‍यन
(द) उन्‍न्‍यन
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या – ‘उन्‍नयन’ की वर्तनी शुद्ध है, शेष की वर्तनी अशुद्ध है। उन्‍नयन का तात्‍पर्य है ऊपर की ओर उठना या ले जाना।
24. एक की वर्तनी शुद्ध है
(अ) आविष्‍कार
(ब) देवार्षि
(स) निशब्‍द
(द) जमाता
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – ‘आविष्‍कार’ की वर्तनी शुद्ध है। शेष निम्‍नवत है-
शुद्ध              अशुद्ध
            देवार्षि             देवर्षि
            निशब्‍द             नि:शब्‍द
            जमाता             जामाता
25. एक वाक्‍य शुद्ध है
(अ) पर्वतीय प्रदेश में प्रात:काल का दृश्‍य बहुत चित्‍ताकर्षक होता है
(ब) प्रत्‍येक धर्म के लिए अच्‍छा सद्भाव रखना हमारा कर्त्‍तव्‍य है
(स) मेरे वेतन का अधिकांश भाग बच्‍चों की पढ़ाई में ही खर्च हो जाता है
(द) इस बात का स्‍पष्‍टीकरण करना आवश्‍यक है
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – ‘पर्वतीय’ प्रदेश में प्रात:काल का दृश्‍य बहुत चित्‍ताकर्षक होता है’ एक शुद्ध वाक्‍य है। विकल्‍प (ब) में ‘अच्‍छा’ के साथ ‘सद्भाव’ शब्‍द प्रयुक्‍त हुआ है जो कि अशुद्ध है विकल्‍प (स) में ‘अधिकांश’ के साथ ‘भाग’ शब्‍द का प्रयोग अशुद्ध है इसी प्रकार विकल्‍प (द) में ‘स्‍पष्‍टीकरण’ के साथ ‘करना’ शब्‍द प्रयुक्‍त हुआ है, जो कि अशुद्ध है।
26. एक की वर्तनी शुद्ध है
(अ) राज्‍य महल
(ब) कोमलांगिनी
(स) निरोग
(द) अक्षौहिणी
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – ‘अक्षौहिणी’ शब्‍द की वर्तनी शुद्ध है। शेष निम्‍नवत हे-
            शुद्ध              अशुद्ध
            राज्‍य महल         राजमहल
            कोमलांगिनी         कोमलांगनी
            निरोग             नि:रोग
27. एक वाक्‍य शुद्ध है
(अ) यह तो अच्‍छा हुआ कि चोरों का पदार्पण होते ही में जाग गया
(ब) अच्‍छे लेखन के लिए शब्‍द संयम आवश्‍यक हे
(स) कक्ष में असंख्‍य जनसमूह उपस्थित था
(द) ‘रामचरित मानस’ तुलसी की सबसे सुन्‍दरतम कृति है
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या – ‘अच्‍छे लेखन के लिए शब्‍द संयम आवश्‍यक है’ एक शुद्ध वाक्‍य है। विकल्‍प (अ) में ‘पदार्पण’ के साथ ‘होते ही’ अशुद्ध है। विकल्‍प (स) में असंख्‍य के साथ ‘जनसमूह’ शब्‍द का प्रयोग अशुद्ध हे जबकि विकल्‍प (द) में ‘सबसे’ के साथ ‘सुन्‍दरतम’ का प्रयोग अशुद्ध है। 
28. एक वाक्‍य शुद्ध है

(अ) खेत जोतने के पारम्‍परिक उपादान हल का स्‍थान अब ट्रैक्‍टर ने ले लिया है
(ब) निरपराधी के विरूद्ध दंडात्‍मक कार्यवाही का किया जाना दुर्भग्‍यपूर्ण है
(स) श्रीमती रेड्डी जिस स्‍तर की नृत्‍यांगना है उनके पति उस स्‍तर के नृत्‍यांगन नहीं है
(द) शिक्षा प्रणाली जनोपयोगी होनी चाहिए
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – ‘शिक्षाप्रणाली’ जनोपयोगी हानी चाहिए’ एक शुद्ध वाक्‍य है। विकल्‍प (अ) में ‘उपादान’ शब्‍द का प्रयोग अशुद्ध है। उपादान का तात्‍पर्य व्‍यवहार में आने वाली वस्‍तुओं के बनाने की सामग्री से है। विकल्‍प (ब) में प्रयुक्‍त ‘निरपराधी’ के स्‍थान पर ‘निरपराध’ शब्‍द प्रयुक्‍त होना चाहिए जबकि विकल्‍प (स) में ‘नृत्‍यांगन’ शब्‍द के स्‍थान पर ‘नर्तक’ शब्‍द प्रयुक्‍त होना चाहिए।
29. ‘मदिरा पीने का प्‍याला’ के लिए एक शब्‍द है
(अ) चश्‍म
(ब) चशक
(स) चश्‍क
(द) चषक
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – ‘मदिरा पीने का प्‍याला’ के लिए एक शब्‍द ‘चषक’ प्रयुक्‍त होता है। चषक एक विशेष प्रकार का प्‍याला होता है जिससे मदिरा या अन्‍य द्रवों को पिया जाता है। इसमें अक्‍सर बीच में एक तंग गर्दन होती है और नीचे एक चौड़ा हिस्‍सा होता है जिस पर इसे टिकाया जाता है।
30. जो स्‍त्री के वशीभूत है, के लिए एक शब्‍द है
(अ) स्‍त्री प्रेमी
(ब) स्‍त्रैण
(स) स्त्रियोचित
(द) त्रियावशी
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या – ‘जो स्‍त्री के वशीभूत है के लिए एक शब्‍द ‘स्‍त्रैण’ प्रयुक्‍त होता है। स्त्रियोचित का तात्‍पर्य स्त्रियों के समान गुण वाले से है जबकि जो स्‍त्री से प्रेम करता है उसे ‘स्‍त्री प्रेमी’ कहा जाता है।
31. एक वाक्‍य शुद्ध है
(अ) भारतवर्ष के अतीत में कई निर्दयी शासक हुए है
(ब) एकत्रित भीड़ जयजयकार कर रही है
(स) गाँधीजी चरखा चलाते थे
(द) एक-एक करके प्रत्‍येक छात्र कक्षा से निकल गए
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – प्रश्‍नगत विकल्‍प (स) में ‘गाँधीजी चरखा चलाते थे’ वाक्‍य शुद्ध है। विकल्प (अ) में ‘निर्दयी’ के स्‍थान पर ‘निर्दय’ शब्‍द प्रयुक्‍त होना चाहिए विकल्‍प (ब) में ‘एकत्रित’ शब्‍द का प्रयोग अनुचित है जबकि विकल्‍प में ‘एक-एक’ और ‘प्रत्‍येक’ दोनों का एक साथ प्रयोग अनुचित है।
32. एक वाक्‍य शुद्ध है
(अ) स्‍वामी विवेकानंद का भाषण सुनकर उपहास उड़ाने वाले अमरीकियों पर घड़ों पानी पड़ गया।
(ब) बाजार का साप्‍ताहिक अवकाश सोमवार को रहता है
(स) वह दुखी स्‍त्री वैधव्‍यता का जीवन बिता रही है
(द) में सपरिवार सानन्दित हूँ
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – प्रश्‍नगत विकल्‍प (अ) में प्रयुक्‍त वाक्‍य शुद्ध है जबकि विकल्‍प (ब) में ‘अ‍वकाश’ के स्‍थान पर ‘बंदी’ शब्‍द प्रयुक्‍त होना चाहिए, विकल्‍प (स) में ‘वैधव्‍यता के साथ ‘स्‍त्री’ का प्रयोग निरर्थक है जबकि विकल्‍प (‍द) में ‘सानान्दित’ के स्‍थान पर ‘आनन्दित’ शब्‍द प्रयुक्‍त होना चाहिए।
33. ‘सवाल-जवाब’,’बहस’- हुज्‍जत’ या ‘दिए गए उत्‍तर पर उत्‍तर’ के लिए एक शब्‍द है
(अ) उत्‍तरापेक्षी
(ब) उत्‍तरण
(स) प्रत्‍युत्‍तर
(द) उत्‍तरोत्‍तर
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – ‘सवाल-जवाब’,’बहस-हुज्‍जत’ या ‘दिए गये उत्‍तर पर उत्‍तर’ के लिए एक शब्‍द ‘प्रत्‍युत्‍तर' प्रयुक्‍त किया जाता है। ‘उत्‍तरण’ का तात्‍पर्य तैरकर या नाव आदि के द्वारा जलाशय पार करना होता है जबकि ‘उत्‍तरोत्‍तर का तात्‍पर्य हे क्रमागत रूप से आगे बढ़ते जाना।
34.‘व‍ह कन्‍या जिसके साथ विवाह का वचन दिया गया है’- के लिए एक शब्‍द है
(अ) वाग्दत्‍ता
(ब) वाग्‍दान
(स) वाग्‍बद्ध
(द) वाग्विद्ग्‍ध
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – ‘वह कन्‍या जिसके साथ विवाह का वचन किया गया है’ के लिए एक शब्‍द ‘वाग्‍दत्‍ता’ प्रयुक्‍त किया जाता है। ‘वाग्‍दान’ का अर्थ है कन्‍या के विवाह की बात किसी से पक्‍की करना और उसे कन्‍यादान का वचन देना जबकि ‘वाग्‍बद्ध’ का तात्‍पर्य ‘मौन’ अथवा ‘वचनबद्ध’ होने से है।
35. ‘ऐसी जीविका जिसका कुछ ठीक – ठिकाना न हो’ के लिए एक शब्‍द है
(अ) आकाश कुसुम
(ब) आकाशवृत्ति
(स) आकाश सलिल
(द) आकाशफल
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या – ‘ऐसी जीविका जिसका कुछ ठीक-ठिकाना न हो’ के लिए एक शब्‍द ‘आकाशवृत्ति’ प्रयुक्‍त होता है। ‘आकाश फल’ शब्‍द ‘संतान’ अथवा ‘संतति’ के लिए प्रयुक्‍त होता है जबकि ‘अनहोनी’ या असंभव बात के लिए ‘आकाश कुसुम’ शब्‍द प्रयुक्‍त होता है।
36. मरणासन्‍न अवस्‍था वाला के लिए एक शब्‍द है
(अ) मैमर्त्‍य
(ब) मुमूर्षु
(स) मृतगामी
(द) निर्विकारी
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – ‘मरणासन्‍न अवस्‍था के लिए एक शब्‍द’ ‘मैमर्त्‍य प्रयुक्‍त होता है। मृतगामी का तात्‍पर्य है जो मृत्‍यु को प्राप्‍त कर चुका हो जबकि निर्विकारी का आशय विकार से रहित होने से है। उल्‍लेखनीय हे कि ‘मरने की इच्‍छा वाला’ के लिए ‘मुमूर्ष’, ‘जिसे मर जाने की कामना हो’ के लिए ‘मुमूर्षु’ और ‘मर जाने की कामना’ के लिए ‘मुमूर्षा’ शब्‍द प्रयुक्‍त होता है। 
37. जिसे अपनी जगह से अलग कर दिया गया हो, के लिए एक शब्‍द है
(अ) विस्‍थापित
(ब) अवस्‍थापित
(स) संस्‍थापित
(द) संस्‍थाजित
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या –‘जिसे अपनी जगह से अलग कर दिया गया हो’ के लिए एक शब्‍द ‘विस्‍थापित’ प्रयुक्‍त होता है जबकि ‘संस्‍थापित’ का आशय ‘संचित’ या ‘इकट्ठा करना’ अथवा ‘चलाया या प्रचलित’ किया हुआ से है।
38. ‘बुरे उद्देश्य से की गयी गुप्‍त मंत्रणा’ के लिए एक शब्‍द है
(अ) दुरतिक्रम
(ब) दुरधिगम
(स) दुरभिसंधि
(द) दुरभियोजन
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या -‘बुरे उद्देश्य के साथ की गयी गुप्‍त मंत्रणा’ के लिए एक शब्‍द ‘दुरभिसंधि’ प्रयुक्‍त किया जाता है। किसी को संकट में डालने के लिए बनाई जाने वाली योजना को ‘दुरभियोजन’ कहा जाता है और जिसके पास पहुँचना कठिन हो, दुर्लभ, दुष्‍प्राप्‍य अथवा दुर्बोध के लिए एक शब्‍द ‘दुरधिगम’ प्रयुक्‍त होता है जबकि जिसका अतिक्रमण या उल्‍लंघन सहज में न हो सके के लिए एक शब्‍द ‘दुरतिक्रम’ प्रयुक्‍त किया जाता है।
39. तद्भव ‘चबूतरा’ का तत्‍सम रूप है
(अ) चर्वतर
(ब) चर्वुतरा
(स) चार्वूतरा
(द) चत्‍वाल
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – ‘चबूतरा’ एक तद्भव शब्‍द है जिसका तत्‍सम शब्‍द ‘चत्‍वाल’ अथवा ‘चत्‍वर’ होता है।
40. निम्‍नलिखित में से एक तद्भव शब्‍द है
(अ) पूंजी
(ब) नयन
(स) मूर्ख
(द) शकुन
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – ‘पूंजी’ एक तद्भव शब्‍द है जिसका तत्‍सम शब्‍दपुञ्ज होता है।
41. ‘बेंत’ का तत्‍सम रूप है
(अ) वेन्‍त
(ब) वेत्र
(स) वेन्‍त्र
(द) वेंतृ
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या – ‘बेंत’ एक तद्भव शब्‍द है जिसका तत्‍सम शब्‍द ‘वेत्र’ होता है।
42. ‘युद्ध की इच्‍छा रखने वाला’ के लिए एक शब्‍द है
(अ) योद्धा
(ब) युद्धरत
(स) युद्धवीर
(द) युयुत्‍सु
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – ‘युद्ध की इच्‍छा रखने वाले’ के लिए एक शब्‍द ‘युयुत्‍सु’ प्रयुक्‍त किया जाता है जबकि ‘जो युद्ध में लगा हुआ हो’ के लिए एक शब्‍द ‘युद्धरत’ प्रयुक्‍त किया जाता है।
43. ‘तैरने या पार होने का इच्‍छुक’ के लिए एक शब्‍द है
(अ) तैराक
(ब) तितीर्षु
(स) तारक
(द) तारणक
उत्‍तर (ब)
व्‍याख्‍या – ‘तैरने या पार करने का इच्‍छुक’ के लिए एक शब्‍द ‘तितीर्षु प्रयुक्‍त होता है जबकि ‘तैराक’ उसके लिए प्रयुक्‍त होता है जो खूब अच्‍छी तरह तैरना जानता हो और ‘तारक’ का तात्‍पर्य ‘आँख की पुतली’ अ‍थवा ‘तारों से भरा हुआ’ है।
44. ‘चना’ का तत्‍सम रूप है
(अ) चणक
(ब) चणा
(स) चाणक
(द) चणाक
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या –चना एक तद्भव शब्‍द है जिसका तत्‍सम शब्‍द ‘चणक’ होता है।
45. ‘ऊन’ का तत्‍सम रूप है
(अ) ऊन्‍य
(ब) ऊर्ण्‍य
(स) ऊरण
(द) ऊर्ण
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – ‘ऊन’ एक तद्भव शब्‍द है जिसका तत्‍सम शब्‍द ‘ऊर्ण’ होता है।
46. ‘थाली’ का तत्‍सम रूप है
(अ) स्‍थाली
(ब) थालिका
(स) थ्‍याली
(द) थालि
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – ‘थाली एक तद्भव शब्‍द है जिसका तत्‍सम शब्‍द ‘स्‍थाली’ होता है।
47. ‘जामुन’ का तत्‍सम रूप है
(अ) यामुन
(ब) यामुण
(स) जंबु
(द) जांबूण
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – ‘जामुन’ एक तद्भव शब्‍द है जिसका तत्‍सम शब्‍द ‘जंबु’ होता है।
48. एक तत्‍सम शब्‍द है
(अ) अनहित
(ब) विनती
(स) डाकिनी
(द) अटारी
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – ‘अनहित’, ‘विनती’ और अटारी तद्भव शब्‍द है जबकि ‘डाकिनी’ एक तत्‍सम शब्‍द है जिसका तद्भव ‘डाइन’ होता है।
49.एक तद्भव शब्‍द है
(अ) पंजर
(ब) पंचाली
(स) पंडित
(द) पंजीरी
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – पंजर, पंचाली और पंडित तत्‍सम शब्‍द है जबकि ‘पंजीरी’ तद्भव शब्‍द है।
50. एक तद्भव शब्‍द है
(अ) अटल
(ब) आतुर
(स) अतिथि
(द) अजिर
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या -‘आतुर’, ‘अतिथि’ और अजिर तत्‍सम शब्‍द है जबकि ‘अटल’ एक तद्भव शब्‍द है।
51. एक विशेषण शब्‍द नहीं है
(अ) लजीला
(ब) लाड़ला
(स) लांछन
(द) लापता
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – संज्ञा अथवा सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्‍द विशेषण कहलाते है और विशेषण के प्रयो‍ग से जिस संज्ञा अथवा सर्वनाम का गुण अथवा धर्म प्रकट होता है, विशेष्‍य कहलाता है। प्रश्‍नगत सन्‍दर्भ में लजीला, लाडला और लापता विशेषण है जबकि लांछन विशेष्‍य है।
52. ‘युद्ध देखकर अशोक का कठोर हृदय मोम जैसा पिघल गया’ – वाक्‍य में विशेष्‍य है
(अ) कठोर
(ब) अशोक
(स) हृदय
(द) मोम
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – ‘युद्ध देखकर अशोक का कठोर हृदय मोम जैसा पिघल गया’, वाक्‍यांश में हृदय विशेष्‍य है जबकि कठोर विशेषण है।
53. निम्‍नलिखित शब्‍दों में से एक विशेषण नहीं है
(अ) श्रव्‍य
(ब) सर्व
(स) गर्व
(द) भव्‍य
उत्‍तर (स)
व्‍याख्‍या – श्रव्‍य, सर्व और भव्‍य विशेषण पद है जबकि गर्व विशेष्‍य पद है। गर्व का विशेषण पद गर्वीला होता है।
54. ‘इन्द्रिय’ का विशेषण शब्‍द है
(अ) इन्‍द्रीय
(ब) इन्द्रिक
(स) ऐन्द्रि
(द) ऐन्द्रिय
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – ‘इन्द्रिय’ शब्‍द का विशेषण पद ‘ऐन्द्रिय’ है जबकि ईश्‍वर का विशेषण ईश्‍वरीय और इतिहास का विशेषण ऐतिहासिक होता है।
55. एक वाक्‍य में विशेषण का प्रयोग नहीं हुआ है
(अ) वह विद्यार्थी है
(ब) वह लड़का विद्यार्थी है
(स) वह प्रबुद्ध विद्यार्थी है
(द) वह परिश्रमी भी है
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – वाक्‍यांश ‘वह विद्यार्थी है’ में विशेषण का प्रयोग नहीं हुआ है जबकि अन्‍य विकल्‍पों में क्रमश: विद्यार्थी, प्रबुद्ध और परिश्रमी विशेषण प्रयुक्‍त हुआ है।
56. ‘भक्‍त की करूण पुकार सुनकर भक्‍त-वत्‍सल भगवान दयार्द्र हो उठे’ – वाक्‍य में प्रयुक्‍त विशेष्‍यों की दृष्टि से कौन सा युग्‍म शुद्ध है?
(अ) भक्‍त तथा भगवान
(ब) करूण तथा दयार्द्र
(स) भक्‍त – वत्‍सल तथा भगवान
(द) पुकार तथा भगवान
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – वाक्‍यांश ‘भक्‍त की करूण पुकार सुनकर भक्‍त-वत्‍सल भगवान दयार्द्र हो उठे’ में पुकार तथा भगवान विशेष्‍य पद है जबकि करूण और भक्‍त–वत्‍सल विशेषण पद है।
57. भोले बालक ने क्रूर डाकू के कठोर हृदय में कोमल भावना जगा दी’ वाक्‍य में कितने विशेष्‍य है?
(अ) चार
(ब) तीन
(स) दो
(द) छह
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – वाक्‍यखण्‍ड ‘भोले बालक ने क्रूर डाकू के कठोर हृदय में कोमल भावना जगा दी’ में चार विशेष्‍य पद बालक, डाकू, हृदय और भावना है जबकि विशेषण पद भी चार है – भोले, क्रूर, कठोर और कोमल।
58. निम्‍नलिखित में से एक विशेषण शब्‍द नहीं है
(अ) वरदान
(ब) वरद
(स) वरदायक
(द) वरणीय
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – वरद, वरदायक और वरणीय विशेषण शब्‍द है जबकि वरदान विशेष्‍य पद है।
59. निम्‍नलिखित में से एक विशेषण शब्‍द है
(अ) लाघव
(ब) महत्‍व
(स) लघुता
(द) महत्
उत्‍तर (द)
व्‍याख्‍या – लाघव, महत्‍व ओर लघुता विशेष्‍य पद है जबकि महत् विशेषण शब्‍द है।
60. निम्‍नलिखित में से एक विशेषण शब्‍द नहीं है
(अ) बहुरूपिया
(ब) बातूनी
(स) बादामी
(द) बांका
उत्‍तर (अ)
व्‍याख्‍या – बांका, बातूनी और बादामी विशेषण पद है जबकि बहुरूपिया विशेष्‍य पद है।


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