Tuesday, 5 September 2017

समायोजन, कुसमायोजन तथा रक्षात्‍मक युक्तियां

समायोजन, कुसमायोजन तथा रक्षात्‍मक युक्तियां
(Adjustment & Maladjustment and Defensive Tips)
समायोजन                                    
                समायोजन शब्द अंग्रेजी के Adjustment का हिन्दी रूपान्तरण है। समायोजन का अर्थ हैसुव्यवस्था अथवा अच्छे ढंग से परिस्थितियों को अनुकूलन बनाने की प्रक्रिया जिससे की व्यक्ति की आवश्यकताएँ पूरी हो जायें और उसमें मानसिक द्वन्द्व की स्थिति उत्पन्न न हो।
                समायोजन की प्रक्रिया से तात्पर्य व्यक्ति की आवश्यकताएँ व उनको पूरा करने वाली परिस्थितियों के बीच तालमेल स्थापित करने से है। जो व्यक्ति इन दोनों (परिस्थिति एवं आवश्यकता) के बीच तालमेल स्थापित नहीं कर पाता है ऐसा व्यक्ति तनाव, चिन्ता, कुण्ठा आदि का शिकार होकर असामान्य व्यवहार करने लग जाता है।
                इस असामान्य व्यवहार को कुसमायोजन/ मानसिक रोग ग्रस्तता कहते है।
समायोजन की मुख्य परिभाषाएँ
कॉलमेन के अनुसारसमायोजन व्यक्ति की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तथा कठिनाईयों के निराकरण के प्रयासों का परिणाम है।
स्मिथ के अनुसारअच्छा समायोजन वह है जो यथार्थ पर आधारित तथा सन्तोष देने वाला है।
स्किनर के अनुसारसमायोजन शीर्षक के अन्तर्गत हमारा अभिप्राय इन बातों से है, सामुहिक क्रियाकलापों में स्वस्थ तथा उत्साहमय ढंग से भाग लेना समय पर नेतृत्व का भार उठाने की सीमा तक उत्तरदायित्व वहन करना तथा सबसे बढ़कर समायोजन में अपने को किसी भी प्रकार को धोखा देने से बचने की कोशिश करना है।
समायोजित व्यक्ति के लक्षण
(1) सुसमायोजित व्यक्ति वातावरण एवं परिस्थितियों का ज्ञान और नियंत्रण रखने वाला एवं उन्हीं के अनुसार आचरण करने वाला होता है।
(2) स्वयं और पर्यावरण के मध्य सन्तुलन बनाये रखता है।
(3) अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के अनुसार पर्यावरण एवं वस्तुओं का लाभ उठाता है।
(4) साधारण परिस्थितियों में सन्तुष्ट और सुखी रहकर अपनी कार्यकुशलता को बनाये रखता है।
(5) उसके उद्देश्य स्पष्ट होते है और वह साहसपूर्वक एवं ठीक ढंग से कठिनाईयों एवं समस्याओं का सामना करता है।

कुसमायोजन
एलेक्जेंडर और स्नीडर्स—''कुसमायोजन से अभिप्राय कई प्रवृत्तियाँ हैं जैसेअतृप्ति, भग्नाशा एवं तनावात्मक स्थितियों से बचने की अक्षमता, मन की अशांति एवं लक्षणों का निर्माण।''
कुसमायोजित व्यक्ति के लक्षण
कुसमायोजित व्यक्ति अपने को वातावरण के अनुकूल नहीं बना पाता है।
वह असामाजिक, स्वार्थी और दु:खी व्यक्ति होता है।
उसके उद्देश्य, अनिश्चिंत और अस्पष्ट होते हैं।
वह घृणा, द्वेष और बदले की भावना रखने वाला होता है।
उसके सामने यदि साधारण-सी बाधा या छोटी-सी समस्या उत्पन्न हो जाती है तो वह अपना संतुलन खो बैठता है।
कुसमायोजित व्यक्ति स्नायु रोग से पीडि़त, मानसिक द्वंद्व एवं कुण्ठा ग्रस्त तथा तनाव से युक्त होता है।
कुसमायोजन के कारण
शारीरिक और भौतिक आवश्यकताओं से उत्पन्न समस्याएँभोजन, आवास, भौतिक संकटों से संरक्षण आदि से होता है।
मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं से उत्पन्न समस्याएँसुविधा, संतोष, कष्ट से मुक्ति, स्वीकृति, स्वतंत्रता, आत्मसम्मान, सफलता और सिद्धि की आवश्यकता और सुरक्षा, स्नेह अपने साथी से आदर और समीपत्व की भावना की आवश्यकता।
व्यक्ति के सामाजिक और सांस्कृतिक पर्यावरण से उत्पन्न समस्याएँ।
कुसमायोजन व्यक्ति में उत्पन्न होने वाले मानसिक रोग
(1) तनावजब व्यक्ति समय परिस्थिति में आवश्यकतानुसार कार्य नहीं कर पाना तथा असफल हो जाता है तो वह तनाव का शिकार हो जाता है।
(2) दुश्चिंताजब अचेतन मन में दमित, इच्छा चेतन में आने लगती है या आने का प्रयास करती है तो व्यक्ति दुश्चिंता का शिकार हो जाता है।
(3) दबावअसफलता व सफलता तथा आत्मसम्मान की रक्षा के समय दबाव उत्पन्न हो जाता है।
(4) भग्नाशा/कुण्ठाबार-बार प्रयत्न करने के बावजूद भी जब व्यक्ति असफल हो जाता है तो वह निराश हो जाता है। इस निराशा को मनोवैज्ञानिक भाषा में भग्नाशा या कुण्ठा कहा जाता है।
(5) द्वन्द्व/संघर्षजब एक साथ दो अवसर उपस्थित हो जाते है तथा चयन किसी एक का करना होता है तो मस्तिष्क में द्वन्द्व या संदेह उत्पन्न हो जाता है।
कुसमायोजन से बचने के उपाय (रक्षात्मक युक्तियां)
(i) प्रत्यक्ष उपाय
(1) बाधाओं को दूर करना
(2) अन्य मार्ग खोजना
(3) लक्ष्य का प्रतिस्थापना
(4) विश्लेषण एवं निर्णय
(ii) अप्रत्यक्ष उपाय
(1) दमन
(2) दिवास्वप्न
(3) आश्रित होना
(4) प्रतिगमन
(5) औचित्य स्थापन/युक्तिकरण/तर्क संगतिकरण
(6) तादात्मीकरण
(7) प्रक्षेपण
(8) प्रतिक्रिया निर्माण या विपरित रचना
(9) विस्थापन
(10) शोधन/मार्गान्तिकरण/शुद्धिरकरण।
अप्रत्यक्ष उपाय
(1) दमनकटु अनुभुतियों, दु:खद बातों तथा अतृप्त इच्छाओं को दबावपूर्वक भुला देना ही दमन कहलाता है।
(2) द्विवास्वप्नहकीकत में जिन इच्छाओं को पूर्ति नहीं हो पाती है। कल्पना के माध्यम से उन इच्छाओं की पूर्ति कर क्षणिक सन्तुष्टि प्राप्त कर लेना ही दिवास्वप्न है।      अन्तरंग में व्यक्ति कल्पना जगत के माध्यम से अपनी खुशियों की तलाश करता है।
(3) आश्रित होनाकर्महीन व्यक्ति पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर होकर समायोजन स्थापित करता है।
(4) प्रतिगमनजो वर्तमान स्थिति व्यक्ति को तनाव देती है उससे बचने के लिए अपनी पूर्व स्थिति की ओर लौट जाना प्रतिगमन कहलाता है। जैसेएक व्यक्ति का फूट-फूट कर कर बच्चों की तरह रोना।
(5) औचित्य स्थापनाकिसी भी कारण से जो पद या वस्तु प्राप्त नहीं हो पाती है तो उसी वक्त उसमें कोई दोष निकालकर समायोजन करना। जैसेअंगूर खट्टे है।
(6) तादात्मीकरणसमायोजन स्थापित करने के लिए व्यक्ति अपना परिचय किसी ऐसे व्यक्ति के साथ तालमेल स्थापित कर लेता हो जिसे समाज में कोई पद या प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति प्रतिष्ठित व्यक्ति के गुणों व अवगुणों का अनुकरण करने लगता है।
(7) प्रक्षेपणअपनी असफलता का दोष किसी ओर पर लगाकर अपने आपको सन्तुष्ट करना।
(8) प्रतिक्रिया निर्माण/विपरीत रचनाकई बार किसी व्यक्ति की इच्छाएँ या आवश्यकताएँ इस तरह की होती है कि उन्हें सामाजिक रूप में प्रकट करना व्यक्ति के हित में नहीं होता क्योंकि इससे उनके सम्मान को खतरा होता है। इससे बचने के लिए विपरीत रचना करता है।
(9) विस्थापनअपनी दमीत भावनाओं तथा आक्रोश को निकालने के लिए व्यक्ति ऐसी वस्तुओं तथा व्यक्तियों को चुनता है जो उससे कमजोर हो तथा जिसके प्रति उत्तर के रूप में हानि पहुँचाने की कम सम्भावना हो।
जैसे—     बालक, जिसे अध्यापक द्वारा अच्छी तरह डाट पड़ी हो तो वह घर आकर अपना गुस्सा अपने छोटे भाई-बहिन को मार पिटकर निकालता है।
माता-पिता की डाँट खाकर बच्चा आक्रोश में फूलों को तोड़कर निकालता है।
निसन्तान दम्पत्ति अपना प्यार और दुलार दूसरों की सन्तान या कुत्ते बिल्ली, पालकर प्रकट करते है।
(10) शोधन/मार्गान्तीकरण/शुद्धिकरणअसामाजिक असामान्य प्रवृत्तियों को सामाजिक/मान्य प्रवृत्तियों में परिवर्तित कर समायोजन स्थापित करना।
जैसेजो विद्यार्थी मार-काट, लड़ते-झगड़ते रहते है या निर्भिक होते है तो उनका खिलाड़ी, मुक्केबाज, पहलवान आदि के रूप में प्रतिष्ठित होना।
शृंगार तथा रसिक प्रवृत्ति के लोगों का चित्रकार मूर्तिकार, गायक, आदि के रूप में प्रतिष्ठित होना।
(iii) क्षतिपूरक उपायजिस क्षेत्र में व्यक्ति कमजोर है उसकी क्षतिपूर्ति किसी अन्य क्षेत्र या साधन के माध्यम से कर समायोजन स्थापित करना। जैसेबौनी लड़की का ऊँची हिल वाली चप्पल पहन कर समायोजन करना।
(iv) आक्रामक उपायकिसी भी कारण से अपने क्रोध पूर्ण व्यवहार को हिंसात्मक (शाब्दिक/क्रियात्मक) तरीके से अभिव्यक्त करना आक्रामकता कहलाती है। आक्रामकता रक्षक भी होती है और भक्षक भी होती है।
                किसी के अनुचित व्यवहार पर अपना क्रोध जताकर आक्रामक रूख अपनाकर अपनी बात को कहना सही बता है। इस तरह असामाजिक तत्त्वों या बुराईयों के प्रति आक्रामकता का रुख अपनाकर अपनी रक्षा करने में कोई बुराई नहीं है।
Adjustment & Maladjustment in Hindi



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