Wednesday, 30 August 2017

विषय-आत्‍मबोधन परीक्षण (T.A.T.) तथा बाल-अन्‍तर्बोध परीक्षण (C.A.T)

विषय-आत्‍मबोधन परीक्षण (T.A.T.) तथा बाल-अन्‍तर्बोध परीक्षण (C.A.T)
विषय-आत्‍मबोधन परीक्षण [Thematic Apperception Test (T.A.T.)]
                इस परीक्षण का निर्माण मर्रे ने सन् 1935 में हारवार्ड विश्‍वविद्यालय, अमेरिका में किया। सन् 1938 में मार्गन के साथ मिलकर इस परीक्षण का संशोधन किया।
· इस परीक्षण को प्रासंगिक अन्तर्बोध परीक्षण तथा कथा प्रसंग परीक्षण भी कहते है।
·  इस परीक्षण में कुल कार्ड = 30 (इनके अलावा एक खाली कार्ड)
· चित्रों से सम्बन्धित कुल कार्ड = 30 (जीवन की विभिन्न परिस्थितियों को दिखाने वाले कार्ड)
·  खाली कार्ड की संख्या=1 (इस पर कहानी लिखने के लिए कहा जाता है)
·  इस परीक्षण में जीवन की विभिन्न स्थितियों को दिखाने वाले कार्डों पर चित्र दिखाये गये।
·  इस परीक्षण के अन्तर्गत 10 कार्डों पर पुरुषों से सम्बन्धित चित्र एवं 10 कार्डो पर स्त्रियों से सम्बन्धित चित्र तथा अन्य 10 पर दोनों से सम्बन्धित चित्र बने होते है।
· यह परीक्षण व्यक्तिगत व सामुहिक दोनों रूपों में प्रयोग किया जा सकता है।
·  यह परीक्षण 14 वर्ष से अधिक आयु वालें बालक-बालिकाओं के लिए विशेष उपयोगी होता है।
·  इसमें व्यक्ति को चित्र दिखाया जाता है, उसके उपरान्त कहानी लिखने को कहा जाता है।
·  इस विधि में बालक-बालिकाओं को विभिन्न कार्ड दिखाकर कहानी, या कथानंक लिखने को कहा जाता है।
·   कार्ड पर अस्पष्ट चित्र बने होते हैं।
·   इस परीक्षण के अन्तर्गत व्यक्ति अपनी खुद की आवश्यकताओं, उद्देश्यों, भावनाओं, कठिनाईयों, समस्याओं, संघर्षों, निराशाओं आदि को प्रस्तुत करता है।
·  इस परीक्षण का क्रियान्वयन दो सत्रों में होता है- पहले सत्र में 10 कार्ड तथा दूसरे सत्र में अंतिम 10 कार्ड व्यक्ति को देकर उसे आधार पर कहानी लिखने को कहा जाता है।
·  मर्रे के अनुसार दोनों सत्रों में कम से कम 24 घंटों का अन्तर होना चाहिए।
·  सभी कार्डों के आधार पर कहानी-लेखन का कार्य समाप्त होने पर साक्षात्कार किया जाता है जिसका उद्देश्य यह जानना हाता है कि कहानी लिखने में व्यक्ति की कल्पनाशक्ति का स्रोत, मात्र चित्र था या कोई बाहर की घटना भी रही।
मर्रे के अनुसार इस परीक्षण का विश्लेषण निम्नांकित प्रसंगों में किया जाता है
1. नायक (Hero) प्रत्येक कहानी में नायक या नायिका का पता लगाया जाता है। ऐसा समझा जाता है कि व्यक्ति इस नायक या नायिका के साथ आत्मीकरण स्थापित कर अपने व्यक्तित्व के शीलगुणों, विशेषकर अपनी महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं को दिखाता है।
2. आवश्यकता (Need) प्रत्येक कहानी में नायक या नायिका की मुख्य आवश्यकताएँ क्या - क्या हैं, इसका पता लगाया जाता है। मर्रे के अनुसार TAT परीक्षण के द्वारा मानव की 28 आवश्यकताओं का मापन होता है। इनमें प्रमुख है - उपलब्धि आवश्यकता, संबंधन आवश्यकता तथा प्रभुत्व आवश्यकता।
3. प्रेस (Press) प्रेस (शक्ति या बल) से तात्पर्य कहानी के उस वातावरण संबंधी बलों से होता है, जिससे कहानी के नायक की आवश्यकता या तो पूरी होती है या पूरी होने से वंचित रह जाती है। मर्रे के अनुसार ये शक्तियां या बल 30 से भी अधिक है जो वातावरण संबंधी है। जैसे-आक्रामकता या आक्रमण तथा शारीरिक खतरा।
4. थीमा (Thema) प्रत्येक कहानी की थीमा का निर्धारण किया जाता है। थीमा से तात्पर्य नायक की आवश्यकता तथा प्रेस अर्थात् वातावरण-संबंधी बल की अन्त:क्रिया से उत्पन्न घटना से होता है। थीमा द्वारा व्यक्तित्व में निरन्तरता का ज्ञान होता है।
5. परिणाम (Outcome) परिणाम से तात्पर्य इस बात से होता है कि कहानी को किस तरह समाप्त किया गया है। कहानी का निष्कर्ष निश्चित है या अनिश्चित है। निश्चित एवं स्पष्ट निष्कर्ष होने से व्यक्ति में परिपक्वता तथा वास्तविकता के ज्ञान होने का बोध होता है।

बाल-अन्‍तर्बोध परीक्षण [Children Apperception Test (C.A.T)]
                इस परीक्षण का निर्माण ल्‍योपोल्‍ड बेलाक ने सन् 1948-49 में किया तथा इसका प्रकाशन सन् 1954 में तथा संशोधित रूप 1993 में भी किया गया।
·   इस परीक्षण को बाल सम्‍प्रत्‍यय परीक्षण भी कहते है। 
·  इसका अन्य संशोधन एवं विकास डॉ. अरनेष्ट क्रिस ने सन् 1951 में भी किया था।
·  इस परीक्षण में 10 कार्डों पर पशुओं के चित्र बने होते है।
·  बालकों को कार्ड/चित्र दिखाकर कहानी लिखने के लिए कहा जाता है।
·  यह परीक्षण भी व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोनों रूपों में प्रयोग में लाया जाता है।
·  यह परीक्षण 3 से 10 वर्ष के बालक-बालिकाओं के लिए उपयोगी है।
· इस परीक्षण में बालक कहानी बनाते समय अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को भी प्रस्तुत करता है, जो बच्चों की समस्याओं को प्रकट करती हैं।

Monday, 28 August 2017

हरमन रोर्शा का स्‍याही धब्‍बा परीक्षण

हरमन रोर्शा का स्‍याही धब्‍बा परीक्षण
(Rorschach's Ink Blot Test)
रोर्शा का स्‍याही धब्‍बा परीक्षण
       प्रक्षेपण परीक्षण में सबसे प्रचलित एवं प्रमुख परीक्षण रोर्शा परीक्षण (Rorschach test) है जिसका प्रतिपादन स्विट्जरलैण्‍ड के मनोचिकित्‍सक हरमन रोर्शा ने सन् 1921 में किया।
इस परीक्षण में 10 कार्ड पर स्याही के धब्बे बने होते है।
5 कार्डों पर काले व सफेद तथा बाकी 5 कार्डों पर विभिन्न रंगों के धब्बे बने होते है।
जे. एस. बालिया ने कार्डों पर चित्रों का वर्णन इस प्रकार किया है—5 कार्ड बिल्कुल काले, 2 कार्ड काले + लाल, 3 कार्ड अनेक रंगों के।
यह परीक्षण व्यक्तिगत रूप से किसी भी आयु वर्ग पर प्रयोग किया जा सकता है।
विशेषकर यह परीक्षण 14 वर्ष से अधिक आयुवर्ग के बालक-बालिकाओं के काम में लिया जाता है।
इस परीक्षण में प्रत्‍येक कार्ड एक - एक करके, उस व्‍यक्ति को दिया जाता है जिसका व्‍यक्तित्‍व मापन किया जाता है। वह व्‍यक्ति कार्ड को जैसे चाहे घुमा - फिरा सकता है और ऐसा करके उसे बताना होता है कि उसे उस कार्ड में क्‍या दिखाई दे रहा है या धब्‍बा का कोई अंश या पूरा भाग उसे किस चीज के समान दिखाई पड़ रहा है।
       व्‍यक्ति द्वारा दिए गए अनुक्रियाओं को लिख लिया जाता है और बाद में उनका विश्‍लेषण कुछ खास-खास अक्षर संकेतों के सहारे निम्‍नांकित चार भागों में बाँटकर किया जाता है
1. स्‍थान निरूपण (Location) - इस श्रेणी  में इस बात का निर्णय किया जाता है कि व्‍यक्ति की अनुक्रिया का संबंध स्‍याही के पूरे धब्‍बे से है या उसके कुछ अंश से है। अनुक्रिया पूरे अक्षर के लिए W से अंकित करते हैं, बड़े धब्‍बे या सामान्‍य अंश के लिये D तथा छोटे धब्‍बे या असामान्‍य के लिऐ Dd का प्रयोग किया जाता है। उजले या सफेद स्‍थानों के लिए अनुक्रिया करने पर S का प्रयोग किया जाता है।
2. निर्धारक (Determinants) - इस श्रेणी में इस बात का निर्णय किया जाता है कि धब्‍बा का कौनसे गुण के कारण व्‍यक्ति अमुक अनुक्रिया करता है। जैसे कि माना व्‍यक्ति किसी धब्‍बे में चमगादड़ होने की अनुक्रिया करता है। इस श्रेणी में लगभग 24 अक्षर संकेतों का प्रतिपादन किया गया है। आकार के लिए F, रंग के लिए, C मानव गति के लिए M, पशु गति के लिए FM तथा निर्जीव गति अनुक्रिया के लिए m आदि।
3. विषय-वस्‍तु - इस श्रेणी में देखा जाता है कि व्‍यक्ति द्वारा दी गई अनुक्रिया की विषय-वस्‍तु क्‍या है। विषय-वस्‍तु मनुष्‍य होने पर H, पशु होने पर A, मानव के किसी अंग के विवरण होने पर Hd तथा पशु के किसी अंग के विवरण के लिए Ad, आग के लिए Fi, यौन के लिए Sx तथा घरेलु वस्‍तुओं के लिए Hh का प्रयोग किया जाता है।
4. मौलिक अनुक्रिया एवं संगठन - मौलिक अनुक्रिया से तात्‍पर्य उस अनुक्रिया से होता है जो अनेक व्‍यक्तियों द्वारा किसी कार्ड  के प्रति अक्‍सर दिए जाते हैं। इसे लोकप्रिय अनुक्रिया भी कहते है। इसका संकेत P है। जैसे प्रथम कार्ड के धब्‍बे को चमगादड़ या तितली बताना एक लोकप्रिय अनुक्रिया का उदाहरण है। अनुक्रियाओं के संगठन के लिए Z संकेत का प्रयोग किया जाता है।
रोर्शा परीक्षण पर दी गई अनुक्रियाओं का विश्‍लेषण
W अनुक्रिया  तीव्र बुद्धि तथा अमूर्त चिन्‍तन का बोध
D अनुक्रिया स्‍पष्‍ट रूप से देखने व समझने की क्षमता का बोध
Dd  अनुक्रिया चिन्‍तन में स्‍पष्‍टता का बोध
S अनुक्रिया नकारात्‍मक प्रवृत्ति तथा आत्‍म-हठधर्मी का बोध
F अनुक्रिया चिन्‍तन के समय एकाग्रता का बोध
A अनुक्रिया बौद्धिक संकीर्णन तथा सांवेगिक असंतुलन का बोध
P अनुक्रिया रूढिगत चिन्‍तन एवं सृजनात्‍मकता का बोध
Z अनुक्रिया उच्‍च बुद्धि, सृजनात्‍मकता तथा निपुणता का बोध
रोर्शा के समान ही एक दूसरा स्‍याही धब्‍बा परीक्षण होल्‍जमैन ने सन् 1961 में प्रतिपादित किया। जिसमें कुल दो फार्म एवं 45 कार्ड होते है। लेकिन यह रोर्शा के समान लोकप्रिय नहीं हो सका।

Rorschach's Ink Blot Test in Hindi



Saturday, 26 August 2017

Methods of Personality Measurement (व्‍यक्तित्‍व मापन की विधियां) in Hindi

व्‍यक्तित्‍व मापन की विधियां
            मनोवैज्ञानिकों ने व्‍यक्तित्‍व-मापन की बहुत सी विधियों या परीक्षणों का प्रतिपादन किया। ऐसी प्रमुख विधियां एवं परीक्षण निम्‍न है
(अ) व्‍यक्तित्‍व आविष्‍कारिका
(ब) प्रक्षेपण विधियां
(स) प्रेक्षण विधियां
(अ) व्‍यक्तित्‍व आविष्‍कारिका (Personality Inventory) व्‍यक्तित्‍व मापने की यह विधि काफी प्रचलि‍त विधि  है। इस विधि में व्‍यक्तित्‍व के खास-खास शीलगुणों से संबंधित कुछ प्रश्‍न बने होते हैं, जिनका उत्‍तर प्राय: हाँ  या नहीं, सही या गलत आदि में दिया जाता है। जैसे -
क्‍या आपको अनिद्रा की शिकायत है ?                            हाँ / नहीं
क्‍या आप बिना किसी कारण के चिन्‍ता करते है ?               हाँ / नहीं
व्‍यक्तित्‍व आविष्‍कारिका के परीक्षण
1. माइनेसोटा मल्‍टीफेजिक पर्सनालिटी टेस्‍ट (एम.एम.पी.आई-2)-इस परीक्षण का निर्माण पहले - पहल हाथावे तथा मैककिनले ने 1940 में किया। इस परीक्षण के मौलिक प्रारुप में 550 एकांश हैं और प्रत्‍येक एकांश के तीन उत्तर हैं 'true', 'false', 'cannot say' । इन तीनों में से किसी एक का जो दिए गए प्रश्‍न के संदर्भ में सही लगता है, चयन किया जाता है। यह आविष्‍कारिका दो प्रकार की होती है - व्‍यक्तिगत एवं सामूहिक।   
2. बेल समायोजन आविष्‍कारिका (Bell Adjustment Inventory) → इस आविष्‍कारिका का निर्माण बेल ने 1934 में किया। इस आविष्‍कारिका का उद्देश्‍य व्‍यक्ति में समायोजन संबंधी कठिनाइयों का पता लगाना होता है। इस आविष्‍कारिका के दो फार्म होते हैं - विद्यार्थी फार्म तथा व्‍यावसायिक फार्म। विद्यार्थी फार्म में कुल 140 एकांश जबकि व्‍यावसायिक फार्म में 140 + 20 = 160 एकांश है।
3. कैटेल 16 व्‍यक्तित्‍व-कारक प्रश्‍नावली (CATTELL 16 Personality-Factor Questionnaire)- इस परीक्षण का निर्माण कैटेल ने कारक विश्‍लेषण के आधार पर किया है। इस प्रश्‍नावली के कई फार्म है जिनके द्वारा 17 वर्ष से अधिक आयुवाले व्‍यक्तियों के 16 शीलगुणों को मापा जाता है। कैटेल ने तीन तरह के शीलगुणों यानि चित्तप्रकृति (temperament), क्षमता (ability) तथा गत्‍यात्‍मक (dynamic) शीलगुण का समावेश किया है।
(ब) प्रक्षेपण विधियां (Projective Methods) →
·         प्रक्षेपण शब्द का अर्थ होता हैआरोपण अर्थात् किसी भी बाहरी वस्तु के माध्यम से आरोपित करते हुए व्यक्ति के अचेतन व अद्र्धचेतन मन के विचारों को जानना। प्रक्षेपण विधि को प्रक्षेपी भी कहा जाता है।
·         प्रक्षेपी विधियों से अचेतन व अद्र्धचेतन मन का ज्ञान किया जाता है। प्रक्षेपण विधि ऐसी विधि है जिसके द्वारा व्यक्ति की छिपी हुई अचेतन मन इच्छाओं और रूचियों आदि का पता लग जाता है।
·         प्रक्षेपण विधि में उत्तेजक परिस्थिति आरोपित कर व्यक्ति अपने विचारों, दृष्टिकोणों, अरमानों तथा इच्छाओं को प्रकट करता है।
·         अपनी बातों, विचारों भावनाओं, अनुभव आदि को स्वयं न बताकर किसी अन्य उद्दीपक के माध्यम से अभिव्यक्त करना।
·         प्रक्षेपण विधियों के माध्यम से अचेतन मन की बातों को ज्ञात किया जाता है।
व्यक्तित्व मापन के लिए मनोवैज्ञानिकों ने कई तरह के प्रक्षेपण परीक्षणों का वर्णन किया है, जो निम्न है
1. शब्द-साहचर्य परीक्षण(Word-association test)
2. रोर्शाख का स्याही धब्बा परीक्षण(Rorsch's Ink Blot Test)
3. विषय-आत्मबोधन परीक्षण (Thematic apperception test or TAT)—
4. वाक्यपूर्ति परीक्षण
5. बाल सम्प्रत्यय परीक्षण (CAT)
6. स्वतंत्र शब्द साहचर्य परीक्षण
(स) प्रेक्षण विधियां (Observational Methods)
            प्रेक्षण विधि वह विधि है जहाँ एक प्रेक्षक व्यक्तियों या छात्रों की क्रियाओं का ध्यानपूर्वक प्रेक्षण एक नियंत्रित परिस्थिति या एक वास्तविक परिस्थिति में करता है तथा फिर उनकी क्रियाओं के लेखा-जोखा का विश्लेषण कर उनके व्यक्तित्व के बारे में एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचता है। ये विधियाँ निम्न प्रकार की होती है
1. रेटिंग मापनी             2. साक्षात्कार विधि
3. आत्मकथा विधि         4. व्यक्ति इतिहास विधि

5. प्रश्नावली विधि          6. अनुसूची विधि

Wednesday, 23 August 2017

Factors Affecting Personality in Hindi (व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक)

Factors Affecting Personality (व्‍यक्तित्‍व को प्रभावित करने वाले कारक)

व्यक्तित्व के निर्धारक
          व्यक्तित्व के निर्धारक से तात्पर्य कुछ वैसे कारकों (factors) से होता है जिनसे व्यक्ति का विकास प्रभावित होता है। मनोवैज्ञानिकों ने इस तरह के कारकों को दो भागों में बाँटा है। कुछ कारक ऐसे हैं जिनका संबंध व्यक्ति की आनुवंशिकता या जैविक प्रक्रियाओं से होता है। कुछ कारक ऐसे हैं जिनका संबंध व्यक्ति के वातावरण से होता है। जन्म के बाद व्यक्ति किसी समाज या संस्कृति के वातावरण में पाला-पोसा जाता है। अत:, वातावरण से संबंधित भी कुछ ऐसे कारक होते हैं जो व्यक्ति के विकास को प्रभावित करते हैं। इन दोनों कारक है -
(अ)     जैविक या आनुवंशिक कारक
(ब)     पर्यावरणीय कारक
(अ)   जैविक या आनुवंशिक कारक
जैविक कारक से तात्पर्य वैसे कारकों से होता है जो आनुवंशिक होते हैं तथा जन्म से पहले से ही व्यक्ति में मौजूद होते हैं, और व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करते हैं। ऐसे प्रमुख कारक निम्न हैं
1. शारीरिक संरचना
व्यक्तित्व का बाहरी स्वरूप व्यक्तित्व विकास पर प्रभाव डालता है।
जैसेएक आकर्षक व्यक्तित्व रखने वाले व्यक्ति अपने आस-पास के लोगों में आकर्षण का केन्द्र होता है।
एक प्रतिभासम्पन्न विभिन्न गुणों से युक्त छोटे कद के दूबले-पतले व्यक्ति को (उसकी शारीरिक संरचना बनावट आकर्षण न होने के कारण) अनदेखी की जाती है।
2. रासायनिक ग्रन्थि के आधार पर
हमारा नाडि तंत्र ग्रन्थियाँ, रक्त, रसायन आदि हमारे  व्यवहार के तरीकों एवं विशेषताओं को बहुत धीमा या अधिक प्रभावित करती है, जिसका प्रभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व पर पड़ता है। व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाली प्रमुख ग्रन्थियां निम्न है
पीयूष ग्रन्थिइस ग्रन्थि का स्थान मस्तिष्क होता है। इस ग्रन्थि के अग्रवर्ती भाग से सोमैटोट्रोपीन या विकास हारमोन्स निकलते है, लम्बाई, मांसपेशियों को प्रभावित करते है। पीयूष ग्रन्थि अन्य अन्त:स्रावी ग्रन्थियों, जैसे एड्रीनल ग्रन्थि, कण्ठ ग्रन्थि तथा यौन ग्रन्थि के कार्यों पर हारमोन्स के द्वारा अपना नियंत्रण रखती है, इसलिये पीयूष ग्रन्थि को 'मास्टर ग्रन्थि' भी कहा जाता है।
एड्रीनल ग्रन्थि इस ग्रन्थि का स्थान वृक्क होता है। इस ग्रन्थि के दो भाग हैं-बाहरी भाग जिसे कार्टेक्स कहते है तथा भीतरी भाग जिसे एड्रीनल मेडुला कहते है। एड्रीनल कार्टेक्स के हारमोन्स को कार्टिन कहते है, जो कार्बोहाइड्रेट तथा नमक चयापचय का नियंत्रण करते है। कार्टेक्स द्वारा सही तरह कार्य नहीं करने पर व्यक्ति में थकान व आलस्य बढ़ जाता है। एड्रीनल मेडुला द्वारा दो तरह के हारमोन्स निकलते हैइपाईनफ्राइन या एड्रीनालीन तथा नारइपाईनफ्राईन या नारएड्रीनालीन। इन दोनों को एक साथ केटकोल हारमोन्स कहते है। एड्रीनालीन को इमरजेन्सी हारमोन्स या आपातकालीन हारमोन्स भी कहते है, क्योंकि यह संवेगों पर नियंत्रण रखता है।
कण्ठ ग्रन्थि (Thyroid gland) इसका स्थान शरीर के कण्ठ के पास होता है। इस गन्थि से निकलने वाले हारमोन्स को थायराक्सीन कहा जाता है, जिसका प्रभाव पूरे शरीर की चयापचय प्रक्रियाओं पर पड़ता है। इसकी कमी से बच्चों में बौनापन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसके अन्य प्रभाव हृदय गति, श्वसन गति, रक्तचाप आदि पर होता है।
उपकण्ठ ग्रन्थि इसका स्थान गण्ठ ग्रन्थि के बगल में होता है और आकार में यह बहुत ही छोटी होती है, जिसका वजन 0.1 ग्राम के करीब होता है। इससे निकले हारमोन्स को पाराथोरमोन कहते है, जो खून में कैलसियम तथा फॉस्फेट की मात्रा का निर्धारक होता है। इसकी कमी से व्यक्ति में शिथिलता बढ़ जाती है। यह तंत्रिका-तंत्र को भी प्रभावित करता है।
पैंक्रिआज ग्रन्थि इसका स्थान आमाशय के नीचे होता है। इससे दो तरह के हारमोन्स निकलते है इनसुलिन तथा ग्लूकागोन। इनसुलिन रक्त में चीनी की मात्रा को नियंत्रित करता है। इन्सुलिन की कमी से व्यक्ति में शुगर की बिमारी होने का खतरा अधिक रहता है।
यौन ग्रन्थि महिलाओं में यौन ग्रन्थि को ओभरी तथा पुरुष की यौन ग्रन्थि को टेस्टीक्ल कहते है। टेस्टीज से निकले वाले हारमोन्स को एण्ड्रोजन कहा जाता है। इससे पुरुषों में प्राथमिक तथा गौण यौन गुणों का विकास होता है। ओभरी से निकलने वाले हारमोन्स को एस्ट्रोजन्स तथा प्रोजेस्ट्रोन कहा जाता है। इससे लड़कियों में गौण यौन गुणों का विकास होता है, जैसे आवाज का महीन हो जाना, शारी के खास अंगों पर घने बाल उग आना, स्तन बढ़ जाना आदि।
3. स्नायुमण्डल (Nervous System) व्यक्तित्व के जैविक निर्धारकों में स्नायुमण्डल का भी प्रमुख स्थान होता है। जिन व्यक्तियों में स्नायुमंडल का अधिक विकास होता है, उनकी बुद्धि तेज होती है तथा वे विपरीत परिस्थितियों में भी समायोजन करने की क्षमता रखते है। जिन व्यक्तियों में स्नायुमण्डल विकसित नहीं हो पाता वे मंद बुद्धि, असामाजिक तथा चरित्र विकृति वाले हो जाते है।
(ब) पर्यावरणी कारक
पर्यावरणीय कारकों को तीन भागों में बांटा गया है
1. सामाजिक कारक
2. सांस्कृतिक कारक
3. आर्थिक कारक
1. सामाजिक कारक सामाजिक कारकों में निम्न को सम्मिलित किया जाता है
माता तथा पिता
परिवार के सदस्यों का आपसी संबंध
जन्मक्रम
स्कूली प्रभाव
आस-पड़ोस
सामाजिक स्वीकृति
2. सांस्कृतिक कारक व्यक्तित्व के विकास में संस्कृति का भी योगदान होता है। संस्कृति का एक व्यापक शब्द है जिसका अर्थ समाज के रीति-रीवाज, आदतें, परम्पराओं, रहन-सहन, तौर-तरीके आदि होता है। प्रत्येक समाज की एक विशेष संस्कृति होती है, जो व्यक्ति को किसी न किसी रूप से प्रभावित करती है। संस्कृति से व्यक्ति के व्यवहार एवं व्यक्तित्व में प्रभाव-पूर्ण परिवर्तन होते है।
3. आर्थिक कारक व्यक्तित्व के शीलगुणों के निर्माण में परिवार की आर्थिक स्थिति का काफी प्रभाव पड़ता है। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने से व्यक्तित्व के विकास तथा शीलगुणों के निर्माण पर बुरा प्रभाव पड़ता है तथा व्यक्तित्व में कुसामायोजन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तथा आर्थिक स्थिति अनुकूल व सुदृढ़ होने पर व्यक्तित्व के गुणों का विकास आसानी से होता है। परन्तु हर बार ऐसा नहीं होता कई बार इसके उलट परिणाम भी देखे जाते है।


CTET 2019 Answer Key Paper - 2 (Class-VI-VIII) Child Development & Pedagogy

CTET 2019 Answer Key Paper - 2 (Class-VI-VIII) Child Development & Pedagogy  ( बाल विकास एवं शिक्षा शास्‍त्र ) 1. विकास में व...