Monday, 31 July 2017

फ्रायड के अनुसार व्यक्तित्व की संरचना (Freud's structure of personality)

फ्रायड के अनुसार व्‍यक्तित्‍व की संरचना (Freud's structure of personality)

फ्रायड के अनुसार व्यक्तित्व की संरचना
            फ्रायड ने व्यक्तित्व की संरचना के दो पहलू बतायें है।
1. गतिशील पहलू
 2. स्थूल रूपरेखीय पहलू

1. गतिशील पहलू
(i) Id (इदम्)इसे सुखवादी सिद्धान्त कहते है।
            इसकी प्रवृत्ति अचेतन होती है अर्थात् से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। इसको इच्छाओं की जननी कहते है। इड़ के स्तर पर व्यक्ति इन्द्रिय जनित सुखों की खोज करता है। ईड़ को अतृप्त इच्छाओं का भण्डार भी कहते है। इच्छा पूर्ति के द्वारा व्यक्ति को सुख की प्राप्ति‍ होती है।
1. सभी मनोदैहिक शक्तियों का आधार भूत स्रोत है।
2. काम प्रवृत्ति की मानसिक शक्तियों का भण्डार है।
3. सच्ची मानसिक यर्थातता है।
4. यह मन/मस्तिष्क का असभ्य भाग होता है। जिसमें आन्तरिक प्रवृत्तियों, मूल प्रवृत्तियों, इच्छाऐं निहित होती है। ये सुख-सिद्धान्त द्वारा निर्देशित होती है।
5. इदम हमारे अन्दर का पशु है, असभ्य अनियंत्रित प्रवृत्तियाँ है।
6. यह अच्छे बुरे के बीच काम नहीं कर सकता है।
7. यह नैतिकता या आशतिकता के विचार से होता है क्योंकि कोई सामाजिक मूल्य या सर्तकता नहीं होती है।
8. तर्कहीन होता है। सुख सिद्धान्त द्वारा प्रभावित होता है।
9. इसमें दबी हुई इच्छाऐं भावनाऐं और विचार निहित होते है।
10. काम प्रवृत्ति का झुण्ड (Reservior of Libido) होता है।
11. सभी मूल प्रवृत्ति का केन्द्र होता है। जीवन एवं मृत्यु मूल प्रवृत्ति। असभ्य आदतों के विकसित किये जाने को प्रोत्साहित करता है।

(ii) Ego (अहम्)वास्तविक सिद्धान्त पर आधारित आदर्शवादी सिद्धान्त पर आधारित।
यह व्यक्ति को उचित-अनुचित का ज्ञान करवाता है। अत: इगो को वास्तविकता का सिद्धान्त (चेतन) भी कहते है। परिणाम की अवस्था है।
1. इदम् की अवैध क्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए अहम् एक सिपाही के रूप में कार्य करता है। यह निर्णय लेने के लिए बुद्धि से कार्य करता है।
2. इदम् की इच्छाओं और यथार्थता की माँगों के बीच समायोजन होता है। इस मन का मुख्य प्रशासक कहा जाता है।
3.  अहम्चेतन व अचेतन। दोनों होता है। लेकिन यह अधिक तौर पर अचेतन चेतना होता है।
4. इसकी प्रकृति तर्कपूर्ण होती है।
5. अहम् मूल प्रवृत्तियों का दबाव, बाहरी यर्थातता और परा अहम् द्वारा नियंत्रण के बीच मध्यस्थ का कार्य करता है।
6. अहम् वास्तविक सत्य है, चेतन बुद्धि का प्रतीक है।

(iii) Super Ego (परा अहम)आदर्शवादी सिद्धान्त पर आधारित।
            यह मन का वह भाग है, जिसे अन्तरात्मा कहा गया है। यह व्यक्तित्व का सर्वोच्च स्तर है एवं यह व्यक्ति में नैतिकता एवं आदर्श का विकास करता है। इसे आदर्शवादी सिद्धान्त कहते है। यह इद्म की अनुचित अभिव्यक्तियों को नियंत्रित रखने का प्रयास करता है।   फ्रायड़ परा-अहम् को अहम् आदर्श (Ego Ideal) कहते है।
1. परा अहम् सामाजिकता और नैतिकता का प्रतीक है।
2. अहम् पर नियंत्रण रखता है।
3. इदम् पर नियंत्रण रखता है।
4. नैतिक समीक्षक है, जो मध्य में अचेतन दोष की भावना बनाए रखता है।
5. परम् - अहम् व्यक्ति के व्यक्तित्व का नैतिक शास्त्र होता है। यह एक आदर्श स्वत्व और अन्तरात्मका का प्रतिनिधि होता है।

2. स्थूल रूपरेखीय पहलू
(1) चेतन मन 1/10 भाग, मस्तिष्क में जाग्रत अवस्था चेतन मन है।
            मन का वह भाग जो तत्काल जानकारी से सम्बन्धित होता है। यह उन सभी विचारों, भावनाओं और धारणाओं से निर्मित होता है। जिनको बिना अधिक प्रयास किए तत्काल ही स्मरण किया जा सकता है।
(2) अचेतन मन 9/10 भाग, कटु अनुभूतियों, दु:खद बातों, तथा अतृप्त इच्छाओं का भण्डार। (अचेतन के विचार जब चेतन में आते है, तो संघर्ष होता रहता है।)
इसे दमित इच्छाओं और प्रवृत्तियों का भण्डार (गृह) माना गया है।
फ्रायड ने अचेतन मन पर सर्वाधिक बल दिया।
व्यक्ति के कवेल ऊपरी व्यवहार को देखकर किसी व्यक्ति का अध्ययन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि अधिकतर दबी इच्छाऐं, विचार, भावनाऐं अचेतन में रहती है और हमारे व्यवहार को निरन्तर प्रभावित करती रहती है।
(3) अर्द्धचेतन मनचेतन और अचेतन के बीच की अवस्था।
याद की हुई बातों को अचानक भुल जाना, अटक जाना, हकलाजाना आदि बातें अर्द्धचेतन मन को प्रदर्शित करती है।
यह मन का वह भाग है, जहाँ तुरन्त स्मृति में लाई जाने योग्य जानकारी स्थित है या व्यक्ति के मन का वह भाग है जहाँ तक तत्काल रूप से व्यक्ति अपनी स्मृति या विचारों को वापिस ला सकता है।
चेतन तथा अचेतन दोनों के बीच की अवस्था है। याद आना फिर भूल जाना, अटक जाना, हकलाना आदि अवचेतन के कारण होता है।
अचेतन के अस्तित्व के कारण
1. स्वप्न अचेतन के अस्तित्व को सिद्ध करते है।
2. अचानक याद आना।
3. सम्मोहन की अवस्था।
4. चेतना शून्य करने के बाद व्यक्त किये गए विचार।
5. गलती से मुँह से निकले शब्द और लिखने में गलतियाँ।
6. निद्रा की अवस्था में समस्याओं का समाधान।
7. स्नायु विकृतियों और मनोविकृतियाँ।
फ्रायड ने दो प्रकार की मूल प्रवृत्ति प्रतिपादित की है
(1) जीवन मूल प्रवृत्ति अथवा यौन प्रेम
जीवन जीने के लिए साधन जुटाने के लिए अभिप्रेरित करती है।
इसका सम्बन्ध ऊर्जा या जीवन से होता है, जिसके कारण व्यक्ति निर्माण रूपी कार्य करता है। काम शक्ति में सभी जीवन मूल प्रवृत्तियों से सम्बन्धित शक्ति शामिल है। इसमें काम वासना, भूख, प्यास शामिल है, जिसके लिए फ्रायड ने यौन-प्रेम 'इरोस' शब्द का प्रयोग किया है।

(2) मृत्यु मूल प्रवृत्ति अथवा मूमूर्षा (थेना टोस)
इसका संबंध विध्वंस एवं विनाश से है। फ्रायड का दावा है कि जीवन का उद्देश्य मृत्यु हैमृत्यु प्राप्त करने की अचेतना भावना ही मृत्यु मूल प्रवृत्ति है। इसके लिए फ्रायड ने 'थेनाटोस' शब्द का प्रयोग किया था।
सिगमन फ्रायड ने स्वमोह की बात की है। स्वमोह को नार्सेजिज्म भी कहा है।
ओडिपस व एलेक्ट्रा ग्रन्थि - ओडिपस ग्रन्थि लड़कों में होने के कारण वे अपनी माँ से अधिक प्रेम करते है तथा लड़कियों में एलेक्ट्रा ग्रन्थि होने के कारण वे अपने पिता से अधिक प्रेम करती है।
लिबिडो (Libedo)(काम शक्तियों को कहते है, जिनसे सुख की प्राप्ति होती है।) प्रेम, स्नेह व काम प्रवृत्ति को सिगमन फ्रायड ने लिबिडो कहा है। यह एक स्वाभाविक  प्रवृत्ति है और यदि इस प्रवृत्ति का दमन करने की कोशिश की जाती है तो व्यक्ति कुसमायोजित हो जाता है।

शैशव कामुकता
सिगमन फ्रायड ने शैशव कामुकता की बात की है।
फ्रायड के अनुसार जन्म से ही काम भावनाओं का विकास हो जाता है, जो कि पाँच अवस्थाओं में होता है।
1. मुख्य चूषण अवस्था0-2 वर्ष
2. मल-मूत्र विसर्जन अवस्था0-4 वर्ष
3. यौनांग अवस्था4-6 वर्ष
4. सुप्त अवस्था611 वर्ष
5. जनन अवस्था—(12) किशोर अवस्था से मृत्यु तक।
शैशव कामुकता की बात पर संग्मण्ड फ्रायड का उसके शिष्य जुंग से मतभेद हो जाता है।

स्वमोह (नार्सिसिज्म)
      फ्रायड शैशव अवस्था में बालक अपने रूप पर मोहित हो जाता है एवं स्वयं से प्रेम करने लगता है। इस आत्म प्रेम की भावना को फ्रायड़ ने नार्सिसिज्म कहा है। यह किशोरावस्था में सबसे अधिक है।
नोट
      1. सिगमन फ्रायड के शिष्य युंग (जुंग) व सिगमन फ्रायड में शैशव कामुकता के बीच मतभेद है। जिससे युंग एक अलग सिद्धान्त का प्रतिपादन करते है। जिस सिद्धान्त का नाम विश्लेषणात्मक सिद्धान्त है।
    2. मूल प्रवृत्ति के जनकविलियम मैक्डूगल हैं, जिन्होंने 14 मूल प्रवृत्ति एवं 14 संवेग प्रतिपादित किये।

1 comment:

  1. लाजवाब ब्लोग, उत्कृष्टता का नमूना, जोकि बहुत ही सरल भाषा में मनोविज्ञान का ज्ञान दे रहा है। लेखक को सादर प्रणाम।

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