Saturday, 1 July 2017

प्रारंभिक बाल्‍यावस्‍था में विकास (जन्‍म से 6 वर्ष की आयु)

प्रारंभिक बाल्‍यावस्‍था में विकास (जन्‍म से 6 वर्ष की आयु)
गर्भकालिन अवस्था में शारीरिक विकास
शारीरिक विकास का प्रारम्भ गर्भधारण के साथ-साथ हो जाता है।
गर्भकालिन अवस्था में भू्रण का विकास तीव्र होता है।
गर्भकालिन अवस्था 9 महिने 10 दिन / 280 दिन होती है, गर्भकालिन अवस्था को अध्ययन की दृष्टि से तीन अवस्थाओं में विभक्त किया गया है
गर्भकालीन तीन अवस्थाएँ
(1)          बीज अवस्थायह अवस्था गर्भधारण से 14 दिन तक होती है।
(2)          भू्रणावस्थायह अवस्था 14 दिन से 60 दिन तक होती है।
(3)          गर्भस्थ शिशु की अवस्थाइस अवस्था की अवधि 60-280 दिन तक मानी जाती है।
गर्भकालिन विकास को प्रभावित करने वाले कारक
1.            माता का आहार-
2.            माता का स्वास्थ्य-
3.            माता की संवेगात्मक अनुभुतियाँ-
4.            माता यदि नशा करती हो तो-
5.            अपरिपक्व माता-पिता-
शैशवावस्था व पूर्व बाल्यावस्था में शरीर का विकास (जन्म से 5 या 6 वर्ष)
वैलेन्टाइनयह अवस्था सीखने का आदर्श काल होता है।
20वीं शताब्दी में शिशु पर सर्वाधिक अनुसंधान होने की वजह से क्रो एण्ड क्रो ने 20वीं शताब्दी को शिशु की शताब्दी या बालक की शताब्दी कहा है।
जन्म से 6 वर्ष की तक के शारीरिक विकास को निम्न चरणों में विभक्त किया गया है
1.            भार का विकासइस अवस्था में बालक का भार बालिकाओं की अपेक्षा अधिक होता है। जन्म के समय भार 4-8 पौण्ड (1600 ग्राम से 3 किलो 200 ग्राम) या 1 पौण्ड = 400 ग्राम।
                बालक / बालिका का भार 4 माह में दुगना एवं 1 वर्ष के अन्त में तीन गुना हो जाता है।
2.            लम्बाई का विकासजन्म के शिशु की लम्बाई लगभग 20 इंच होती है एवं पूर्व बाल्यावस्था के दौरान बालक की लम्बाई बालिकाओं की अपेक्षा अधिक होती है।
                उत्तर बाल्यावस्था (6-12 वर्ष) के दौरान बालिकाओं की लम्बाई बालकों की अपेक्षा तीव्र गति से बढ़ती है। इसलिए 12 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते लड़कियो की लम्बाई लड़को की अपेक्षा अधिक रहती है।
3.            हडि्डयों का विकासनवजात शिशु के शरीर में 270 हड्डियाँ होती है। यह हड्डियाँ छोटी, लचीली एवं कोमल होती है। प्रथम वर्ष में हड्डियों का विकास तीव्र गति से होता है एवं द्वितीय वर्ष में हड्डियाँ का विकास मन्द होता है। बालक की हड्डियाँ कैल्सियम एवं खनिज लवणों के कारण लगातार कड़क होती रहती है। इस प्रक्रिया को अस्थि निर्माण की प्रक्रिया कहा जाता है।
4.            दाँतों का विकासबच्चों के दो बार दाँत निकलते है। प्रथम बार जो दाँत निकलते है उन्हे अस्थायी दाँत या दूध के दाँत कहते है। अस्थायी दाँत छोटे एवं कमजोर होते है तथा इन दाँतो की संख्या 20 होती है। दूध के दाँत 6-8 माह की आयु में निकलना प्रारम्भ  होते है। दाँतो के निकलने में कैल्सियम का अत्यधिक  प्रभाव पड़ता है। यदि कैल्सियम की मात्रा बच्चों को ज्यादा दी जाती है तो दाँत जल्दी निकल आते है।
नोट—     लड़को की अपेक्षा लड़कियों के दाँत पहले निकलते है। दूध के दाँत लगभग 3 वर्ष की आयु पूरे निकल आते है एवं 6-7 वर्ष की आयु में ये दाँत गिरकर स्थायी दाँत आने लगते है।
5.            मस्तिष्क का विकासनवजात शिशु की लम्बाई का 22' उसका मस्तिष्क होता है। जबकी प्रौढ़ व्यक्ति में उसके शरीर का लगभग 10' ही होता है।
                प्रथम दो वर्षों में सिर बहुत तीव्र गति से बढ़ता है एवं इससे उसकी गति मन्द हो जाती है। जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क का भार 350 ग्राम होता है। जो उसके शरीर के अनुपात में अधिक होता है।

शैशवावस्था व पूर्व बाल्यावस्था में सामाजिक विकास
सामाजिक विकास की प्रथम पाठशाला परिवार है।
3-4 माह के शिशु में सामाजिक विकास होने लग जाता है।
उदाहरण-इस अवस्था में रोता हुआ बालक अपरीचित व्यक्ति को देखकर शान्त हो जाता है।
2 वर्ष की आयु में शिशु अपने हम उम्र के बालकों के साथ खेलना प्रारम्भ कर देता है।
3 वर्ष की आयु में समूह कार्यो में रूचि लेना प्रारम्भ कर देते है।
6 वर्ष की आयु में सामुहिक खेलों में खेलना प्रारम्भ कर देता है।
आयु                   सामाजिक विकास
1 माह : बालक साधारण आवाजों एवं मानव की आवाजों में अन्तर नही कर पाता।
2 माह : इस आयु में बालक मनुष्य की आवाज पहचानने लग जाता है। दूसरों को मुस्कुराता हुआ देखकर मुस्कराने लग जाता है। गोद में उठाने पर रोना बंद कर देता है।
3 माह : इस समय बालक अन्य महिलाओं में अपनी माँ को पहचान लेता है। और उसके बात करने पर रोना बंद कर देता है।
4 माह : इस समय बालक उठाने पर अपनी बाहे फैलाने लग जाता है। यदि उसके साथ कोई खेलता है तो हँसने लग जाता है।
6 माह : परीचित और अपरीचित में अन्तर कर सकता है। प्रेम और क्रोध के भाव समझता है। तथा उसके अनुरूप प्रतिक्रियाएँ करता है।
8 माह : बालक आवाज व कार्यो का अनुकरण करने लगता है।
1 वर्ष : बड़ो की आवाज सीखना व उनकी आज्ञा मानना प्रारम्भ कर देता है। शीशे में अपना प्रतिबिम्ब देखकर खेलने लगता है।
2 वर्ष : बालक घर के कार्यो में सहयोग करता है।
3 वर्ष : दूसरे बालको के साथ खेलने लगता है।
5 वर्ष : सामूहिक खेलो में रूचि लेना प्रारम्भ करता है।

सांवेगिक विकास
बालक के सांवेगिक विकास और व्यवहार के आधार बालक के संवेग होते है। संवेग बालक के सामाजिक, नैतिक और चारीत्रिक विकास को भी प्रभापित करते है।
जैसे- प्रेम, हर्ष, उत्सुकता आदि सकारात्मक संवेग बालक के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास में योगदान देता है।
जबकि क्रोध, ईर्ष्‍या, भय आदि नकारात्मक संवेग शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को अवरूद्ध एवं कुष्ठित करते है।
परिभाषाऐ:-
1. वुडवर्थ के अनुसारव्यक्ति की उत्तेजना की दशा संवेग होती है।
2. रॉस के अनुसारसंवेग चेतना की वह अवस्था है, जिसमें रागात्मकता की अधिकता रहती है (प्रधानता रहती है)
3. बैलेन्टीन के अनुसाररागात्मकता (लगाव) का वेग बढ़ जाता है। वही संवेग है।
विलियम मैक्डुगल के अनूसार मूल प्रवृतिया व संवेग
क्र.सं.  मूल प्रवृतियाँ (Intinct)    संवेग (Emotions accompanying it)
1. पलायन या भागना (Escape)      -  भय (Fear)
2. युयुत्सा, युद्धप्रियता (Combat)      -  क्रोध (Anger)
3. निवृति (Repulsion)             -  घृणा (Disguest)
4. शिशुरक्षा (Parental)              - वात्सल्य (Tender emotion, Love)
5. शरणागति (Appeal)            - कष्ट, विषाद, करूणा (Distress)
6. काम (सेक्स) (Sex, Mating)      -  कामुकता (Lust)
7. जिज्ञासा (Curiosity)                          -    आश्चर्य (Wonder)
8. अधीनता, दैन्य (Submission)    -  आत्महीनता (Negative Self-feeling)
9. सामूहिकता (Gregariousness)    -  एकाकीपन (Feeling of lonelyness)
10. आत्मप्रदर्शन, आत्मगौरव (Self-assertion) -    श्रेष्ठता की भावना (Positive Self-feeling of elation)
11. भोजनान्वेषण (Food-seeking)     -  भूख (Appetite)
12. संग्रह, संचय प्रवृत्ति (Acquisition)    -  अधिकार/स्वामित्व की भावना (Feeling of Ownership)
13. रचना, रचनात्मकता (Co-Ntruction) -  रचना का आनन्द, संरचनात्मकता (Feeling of creativeness)
14. ह्रास (Laughter)                  - आमोद (Amusement)
शैशवावस्था व पूर्व बाल्यावस्था में सांवेगिक विकास
शिशु के जन्म लेते ही वह रोना, चिल्लाना, हाथ-पैर पटकना आदि सांवेगिक विकास के कारण करता है।
शिशु के सांवेगिक विकास या सांवेगिक व्यवहार में अस्थिरता पायी जाती है।
जैसेरोते-रोते हँसना और हँसते-हँसते रोना।
परन्तु उम्र बढऩे के साथ-साथ संवेगो में स्थिरता आ जाती है।
शिशु के संवेगो में अत्यधिक तीव्रता पायी जाती है जो आयु बढने के साथ-साथ कम होती जाती है।
शिशु के संवेग पहले अस्पष्ट बाद में धीरे-धीरे स्पष्ट हो जाते है।
जैसे-3 सप्ताह के शिशु में उसकी चिल्लाहट से भूख, क्रोध, कष्ठ, स्पष्ट नही होते।
शिशु के संवेगो में लगातार परिवर्तन होता रहता है।
जोन्स के अनुसार-2 वर्ष तक का बच्चा सर्प से नही डरता एवं 5 वर्ष तक की आयु में वह अपने भय पर नियंत्रण नही रख सकता।
जस्टिस (जस्टिन) के अनुसार—3 वर्ष तक की आयु में शिशु अपने साथियों के प्रति प्रेम प्रकट करने लग जाता है।
ब्रिजेज के अनुसारजन्म के समय शिशु में केवल उत्तेजना होती है।

मानसिक विकास
              मानसिक विकास में ज्ञान-भण्डार में वृद्धि तथा वातावरण के साथ समायोजन को लिया जाता है। मानसिक विकास में स्मरण, कल्पना, चिंतन, निरिक्षण, एकाग्रता, बोद्धिक तर्क, निर्णय, अधिगम, बुद्धि आदि शक्तियाँ सम्मिलित होती है।
शैशवास्था में मानसिक विकास
जोन लॉक ने कहा है किनवजात शिशु का मस्तिष्क कोरे कागज की तरह होता है जिस पर अनुभव के साथ-साथ उसकी हर बात को लिख दिया जाता है।
उम्र बढऩे के साथ-साथ बालक की मानसिक शक्तियों में लगातार परिवर्तन होता रहता है। जैसे-
              आयु                        परिवर्तन
(जन्म के बाद)     कष्ठ को रो कर प्रकट करना।  
1 सप्ताह : अचानक तेज ध्वनि सुनने पर भौचक्का हो जाना।
2 सप्ताह : बड़े आकार की चमकीली चीजों ध्यान से देखता है।
1 माह : हाथ से देखने पर वस्तु को पकडने की कोशिश करेगा। सुख और दुख, भूख और प्यास को अलग-अलग तरीके से प्रकट करेगा।
2 माह : सुनने और देखने के लिए सीर को घुमाना। अलग-अलग प्रकार की ध्वनियाँ निकालना।
6 माह : नाम सुनकर देखने की कोशिश करना। क्रोध एवं प्रेम में अन्तर को पहचानना।
8 माह : बालक अपनी पसन्द के खिलोने लेना पसन्द करेगा और दुसरे बालको के साथ खेलाना चाहता है।
1 वर्ष : बालक दुसरो के क्रियाकलापो का अनुकरण करता है तथा 3 से 4 शब्द बोल लेता है।
2 वर्ष : 2 शब्दों के वाक्य बोल सकता है तथा उसका शब्द भण्डार 100-200 हो जाता है।
3 वर्ष : बालक छोटे-छोटे वाक्य बोल सकता है तथा अपना नाम पूछने पर बता सकता है।
4 वर्ष : बालक अक्षर लिखना प्रारम्भ कर देता है तथा 5-10 अंको तक की गिनती बोल सकता है।
5 वर्ष : जटिल वाक्य बोल सकता है। और उनको दोहरा भी सकता है। रंगो के अन्तर को पहचान सकता है।
गुडएनफ  के अनुसारव्यक्ति का जितना भी मानसिक विकास होता है उसका आधा 3 वर्ष की अवस्था में हो जाता है।
विशेष
                1.            संवेदनात्मक स्थिति एवं ज्ञानेन्द्रियों की विश्राम अवस्था (0-2)वर्ष तक।
                2.            प्रतिकारात्मक विचारों की तैयारी की अवस्था (2-4) वर्ष ।
                3.            विवेचना रहित विचार अवस्था (4-7) वर्ष।
                4.            वैचारिक क्रिया अवस्था (7-2) वर्ष।

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