Wednesday, 5 July 2017

उत्तर बाल्‍यावस्‍था में विकास (6 से 12 वर्ष)

उत्तर बाल्‍यावस्‍था में विकास (6 से 12 वर्ष)
उत्तर बाल्यावस्था में शारीरिक विकास

1.  भार का विकासउत्तर बाल्यावस्था (6-12 वर्ष) के दौरान शुरूआती काल में भार में वृद्धि कम होगी जबकी अन्तिम वर्षों में तीव्र गति से वृद्धि होती है। इस अवस्था में लड़को की अपेक्षा लड़कियो के भार में वृद्धि अधिक होती है।
नोट—5 वर्ष के बालक का औसत भार 38 पौण्ड होता है जो की 12 वर्ष की अवस्था में 91 पौण्ड हो जाता है।
2. लम्बाई का विकासउत्तर बाल्यावस्था में शरीर की लम्बाई कम बढ़ती है। इस अवस्था के बालकों की लम्बाई प्रतिवर्ष 2 से 3 इंच वृद्धि होती है। 12 वर्ष की अवस्था में लड़को की अपेक्षा लड़कियो की लम्बाई अधिक होती है। नोटलड़कियो की लम्बाई 15 वर्ष तक तीव्र गति से बढ़ती है जो 18 वर्ष में पहुँचते-पहुँचते स्थिर हो जाती है। तथा लड़को लम्बाई 18 वर्ष तक तीव्र गति से बढ़ती है एवं 22 वर्ष में पहुँचते-पहुँचते स्थिर हो जाती है।
3.  हड्डियों का विकासइस अवस्था में पूर्व से चलती आ रही अस्थि निर्माण की प्रक्रिया चलती रहती है। इस दौरान हड्डियाँ धीरे-धीरे कठोरता प्राप्त करती रहती है। लड़कियो में लड़को की अपेक्षा अस्थि निर्माण की प्रक्रिया तीव्र्र गति से होती है।
4.  दाँतो का विकास6 वर्ष की आयु में दूध के दाँत गिरने और स्थायी दाँत निकलने प्रारम्भ हो जाते है एवं इस अवस्था के अन्त तक (13 वर्ष) की आयु तक स्थायी दाँत निकल आते है।
नोट—     अक्ल डाढे 17 से 25 वर्ष के मध्य में आती है। कम बुद्धि वाले बच्चों में दाँत देरी से और अधिक बुद्धि वाले बच्चों में दाँत जल्दी आना प्रारम्भ होते है।
5.  भाषा का विकासइस अवस्था में बालकों में भाषा विकास अधिक तीव्र गति से होता है। इस अवस्था मेें बालकों में शब्दावली निर्माण में वृद्धि, उच्चारण में स्पष्टता तथा जटिल वाक्यों का प्रयोग आदि अधिक पाया जाता है। बालक स्कूल के शिक्षक से व अन्य लोगों के साथ बातचीत करके, पुस्तक पढ़कर, टेलीविजन आदि देखकर अपनी शब्दावली पर्याप्त संख्या में बढ़ा लेते हैं।
उत्तर बाल्यावस्था में सामाजिक विकास
इस अवस्था में बालकों में ओडीपस एवं बालिकाओ में एलकट्रा ग्रन्थि का विकास होता है। जिसकी वजह से एक बालिका अपने पिता की चहेती एवं बालक अपनी माता का चहेता बनता है।
इस अवस्था में सहयोग, सद्भावना और सामाजिक गुणों का विकास होता है।
इस अवस्था में बालकों में सामुहिक प्रवृतियों का विकास होता है जिसकी वजह से बालक सामुहिक खेलो में या सामूहीकता में रूचि लेता है।
नोट6-7 वर्ष की आयु में बालक मित्र बनाकर खेलता है। तथा वह दूसरों से प्रेम की आशा करता है।
इस अवस्था में बालक खेलों द्वारा अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीखने लग जाता है। जिससे बालक आत्मविश्वास व आत्मबलिदान की भावना विकसित होने लगती है।
विशेषइस अवस्था में बालकों में आदत बनना शुरू हो जाती है। वे अपना एक समूह बनाना चाहते है। और यदि कोई उन्हे रोकता है तो उन्हे वह पसन्द नही लगता। वह सामाजिकता की और अग्रसर होता है। तथा अपने कार्यो में सामाजिक स्वीकारियता चाहता है।
उत्तर बाल्यावस्था में सांवेगिक विकास
उत्तर बाल्यावस्था में संवेग कम शक्तिशाली होते है उनका भय, क्रोध आदि संवेगो पर नियंत्रण हो जाता है।
उत्तर बाल्यावस्था में उत्पन्न संवेग शिष्टतायुक्त होते है तथा बालक में इन संवेगो को दबाने की या नियंत्रित करने की समझ पैदा हो जाती है।
बालक जिन समुहो का सदस्य होता है उनके अवांछित संवेग जैसे-द्वेष, ईष्र्या, घृणा आदि का प्रभाव उन पर पड़ता है।
बालक के सांवेगिक विकास में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है क्योकी शिक्षक द्वारा प्रदत कठोर अनुशासन एवं शारीरिक दण्ड बालक का सांवेगिक विकास अवरूद्ध कर देता है। बालक के संवेगात्मक विकास पर विद्यालयी वातावरण का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है।
विद्यालय में दण्ड, भय, तनाव, आदि के वातावरण से बालकों में मानसिक ग्रन्थियों का निर्माण होता है।
एलिस क्रो के अनुसार—''बालक सामान्य रूप से प्रसन्न रहता है और दूसरों के प्रति उनका द्वेष अस्थायी होता है।''
वाटसन के अनुसारबालक में सबसे पहले भय एवं प्रेम के संवेग उत्पन्न होते है।
उत्तर बाल्यावस्था में मानसिक विकास
उत्तर बाल्यावस्था में बालक शैशवास्था के काल्पनिक जगत को छोड़कर वास्तविक जगत में प्रवेश करता है।
बालक तर्क एवं चिन्तन करने लग जाता है।
उत्तर बाल्यावस्था में बालक का व्यवहार बर्हिमुखी हो जाता है। वह अपने एकांत जीवन की प्रवृति को छोड़कर बाह्य जगत में रूचि लेने लग जाता है।
उत्तर बाल्यावस्था में बालक की सहज एवं मूल प्रवृतियों का विकास हो जाता है।
उत्तर बाल्यावस्था में बालक के नैतिक गुणो का विकास हो जाता है।
उत्तर बाल्यावस्था में बालक रचनात्मक कार्यो और संग्रहण की प्रवृति में रूचि लेना प्रारम्भ करता है।
आयु         मानसिक विकास में परिवर्तन
6 वर्ष : इस अवस्था में बालक सरल प्रश्नो का उत्तर दे सकता है। चित्र या फोटो दिखाने पर सम्बन्धित व्यक्ति का नाम  बता सकता है। 14-15 तक गिनतियाँ बोल सकता है।
7 वर्ष : इस वर्ष में बालक अपनी साधारण समस्याओं को हल करने की कोशिश करता है तथा छोटी-छोटी घटनाओं का वर्णन कर सकता है।
8 वर्ष : इस अवस्था में बालक दो वस्तुओं में अन्तर करना सीख जाता है। छोटी-छोटी कविताओं और कहानियों को दोहरा सकता है।
9 वर्ष : इस अवस्था में बालक सिक्के, दिनाङ्क, समय, महीना इत्यादि का ज्ञान कर सकता है या फि ल्म इत्यादि को देखकर उसका सारांश कह सकता है।
10 वर्ष : इस अवस्था में बालक कविता और कहानियों को याद कर सुना सकता है एवं दैनिक जीवन के कार्य एवं परम्पाराओं का ज्ञान कर लेता है।
11 वर्ष : इस अवस्था में बालक में जिज्ञासा, तर्क, चिन्तन, निरिक्षण की शक्तियों का पर्याप्त विकास हो जाता है तथा बालक विभिन्न प्रकार की वनस्पतियो एवं जीव-जन्तुओं के बारे में जिज्ञासा प्रकट करने की कोशिश करता है।
12 वर्ष : इस अवस्था में बालक की तर्क शक्ति सुदृढ़ हो जाती है। वह किसी भी बात का अपने स्तर पर कारण बता सकता है। तथा अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ढूंढ सकता है।
उत्तर बाल्यावस्था की अन्य विशेषताएँ
  • उत्तर बाल्यावस्था को माता-पिता द्वारा एक उत्पाती या उधमी अवस्था कहा गया है।
  • उत्तर बाल्यावस्था में बालकों में लड़ाई-झगड़ा करने की प्रवृत्ति भी अधिक होती है।
  • शिक्षकों द्वारा उत्तर बाल्यावस्था को प्रारम्भिक स्कूली अवस्था कहा जाता है।
  • उत्तर बाल्यावस्था में बालक अपनी ही उम्र के साथियों के समूह द्वारा स्वीकृति पाने के लिए काफी लालायित रहता है।
  • उत्तर बाल्यावस्था में बालकों में सर्जनात्मक क्रियाओं की ओर अधिक झुकाव होता है।


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