Monday, 10 July 2017

किशोरावस्‍था में विकास (12 से 18/19 वर्ष)

किशोरावस्‍था में विकास (12 से 18/19 वर्ष)

किशोरावस्था में शारीरिक विकास
            किशोरावस्था में बालक को अनेक शारीरिक परिवर्तनो से गुजरना पड़ता है। इसलिए स्टेनले हॉल ने कहा है कि, 'किशोरावस्था बड़े संघर्ष, तनाव, तूफान तथा विरोध की अवस्था है।'
किशोरावस्था में शारीरिक विकास के निम्न चरण हैं
1. भार का विकासकिशोरावस्था में बालिकाओं की अपेक्षा बालकों का भार अधिक बढ़ता है। इस अवस्था (12-19 वर्ष) में बालकों का भार बालिकाओं की अपेक्षा 24-25 पौण्ड अधिक हो जाता है। जबकि 13-14 वर्ष की आयु में लड़कियों में प्रजनन क्षमता उत्पन्न हो जाती है। तथा 15-16 वर्ष की आयु में लड़कों में पिता बनने के गुण उत्पन्न हो जाते है।
2. लम्बाई का विकासबालिकाओं का कद 11 से 15 वर्ष की आयु में तीव्र गति से बढ़ता है। जबकि 15-18 वर्ष की आयु में बालकों की ऊँचाई तेजी से बढ़ती है।
नोटलड़कियों में 15 वर्ष और लड़कों में 18 वर्ष के बाद ऊँचाई में बहुत कम परिवर्तन होता है।
3. हड्डियों का विकासकिशोरावस्था के अन्त तक बालक बालिकाओं में काफी परिपक्वता आ जाती है। तब उसकी कई हड्डिया आपस में जुड़ जाती है जिससे उनकी हड्डियों की संख्या 206 हो जाती है। इस प्रकार इस अवस्था में हड्डियाँ पूर्ण रूप से विकसित एवं मजबूत हो जाती है।
4. दाँतो का विकासकिशोरावस्था के प्रारम्भ में अक्ल ढाढो के अलावा सभी स्थायी दाँत आ जाते है तथा किशोरावस्था के अन्तिम चरण में अक्ल ढाढे भी आ जाती है। जिससे स्थायी दाँतो की संख्या 32 हो जाती है।
विशेष
वेलेन्टाइन-
            1. किशोरावस्था प्रतिभा प्रदर्शन करने की अवस्था है।
            2. शैशवावस्था सीखने का आदर्श काल है।
बालक का विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है।
किशोरो को व्यैक्तिक निर्देशन की सर्वाधिक जरूरत होती है।
यदि किशोरों में प्रतिभा प्रदर्शन के अवसरों की प्रतिकूलता रहती है तो उनमें द्वन्द्व उत्पन्न हो जाता है।
किशोरावस्था में सामाजिक विकास
(12-19 वर्ष) इस अवस्था में समाज सेवा की भावना चरर्मोत्कर्ष होती है।
इस अवस्था में योन ग्रन्थियों में विकास होने के कारण लडके-लडकियां आपस में मिलना पसन्द करते है। बात करना पसन्द करते है। ज्यादा से ज्यादा एक दूसरे के साथ समय बिताना पसन्द करते है। सामाजिक कार्यो में रूचि लेना पसन्द करते है।
इस अवस्था में कोई भी किशोर अपने दल या साथियों की प्रतिष्ठा के लिए त्याग करने को तत्पर रहता है।
नोट—  यदि इस अवस्था में उद्देश्य समान हो तो बनने वाले मित्र स्थायी होते है।
लड़कियों का सामाजिक विकास परिपक्वता के लिए होता है और वे लड़को से तत् सम्बन्धित चर्चा एवं साहित्य में अधिक रुचि लेती है।
किशोरावस्था में लैंगिक चेतना विकसित होने की वजह से विपरित लिंगी के प्रति आकर्षण बढ़ता है। तथा विपरित लिंगी से मित्रता कायम रखनेे की कोशिश की जाती है।
इस अवस्था के बालकों में नेतृत्व क्षमता का विकास होता है और अपने समूूह के प्रति स्वामीभक्ति प्रकट करता है।
नोट—3 वर्ष की अवस्था तक बालक का परिवार व्यवहार आत्मकेन्द्रित होता है। जन्म के समय शिशु न तो सामाजिक होता है न ही असामाजिक होता है।
किशोरावस्था में सांवेगिक विकास
किशोर प्रेम, दया, क्रोध, घृणा, सहानुभूति आदि संवेग स्थायी रूप से धारण कर लेता है तथा इन पर उसका नियंत्रण नही होता।
कोल व बुश के अनुसार''किशोरावस्था के आगमन का मुख्य चिहन सांवेगिक विकास में तीव्र परिवर्तन है।''
स्वस्थ किशोर में सांवेगिक स्थिरता व अस्वस्थ (निर्बल) किशोर में सांवेगिक अस्थिरता पायी जाती है।
यदि कोई किशोर अपने प्रयासों में असफ लता प्राप्त करता है तो वह घोर निराशावादी बन जाता है।
किशोर अपनी कमियों एवं समस्याओं के प्रति चिन्तित रहता है।
किशोर सांवेगिक सन्तुष्टि की दृष्टि से अपने मित्रों पर अधिक विश्वास करता है।
सांवेगिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
         1. स्वास्थ्य                 2. थकान
         3. परिवार                  4. माता-पिता का दृष्टिकोण
         5. मानसिक योग्यता         6. आशाएँ
         7. निर्धनता                 8. विद्यालय
         9. शिक्षक                  10. सामाजिक स्थिति।
विशेष
     1.    मनुष्य एवं अन्य प्राणियों में एक ही प्रकार के संवेग पाये जाते है।
     2.    बालकों की अपेक्षा बालिकाओं में क्रोध, प्रदर्शन, करने की प्रवृति अधिक पायी जाती है।
     3.    क्रोध व आक्रमकता की उपस्थिति असन्तोष या निराशा से होती है।
     4.    भय से चिन्ता और चिन्ता से मरिचिका (फोबिया) हो जाती है।
     5.    भीषण विपत्ति की आंशका और उसका सामना न कर पाने की विवशता से भय उत्पन्न होता है।
     6.    संवेगात्मक अवस्था में व्यक्ति में मनोवैज्ञानिक परिवर्तन होते है।

किशोरावस्था में मानसिक विकास
किशोरावस्था को क्रान्तिकारी परिवर्तन का काल कहा जाता है।
किशोरावस्था तूफान और संवेगो की अवस्था मानी जाती है।
किशोरावस्था को पाश्चात्य विद्वानों ने 'टीन एज' कहा है। तथा कुछ विद्वानों ने 'एज ऑफ ब्यूटी' कहा है।
किशोरों को यदि अनुकूल अवसर नही मिला तो उनमें चिडचिडापन और द्वन्द्व उत्पन्न हो जाता है।
कॉल सैनिक के अनुसारकिशोरो की मानसिक जिज्ञासा का विकास होता है वह समस्याओं के सम्बन्ध में अपने विचारों का निर्माण भी करता है।
स्टेनले हॉल के अनुसारकिशोरावस्था संघर्ष, तूफान, तनाव तथा विरोध की अवस्था है।
किल पैट्रिक के अनुसार-इस बात पर काई मतभेद नही हो सकता की किशोरावस्था जीवन का सबसे कठि‍न काल है।
किशोरावस्था में ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता विकसित हो जाती है वह अमूर्त (अदृश्य) चिन्तन कर सकता है उसमें चंचलता समाप्त हो जाती है और 16 वर्ष की आयु तक स्मरण शक्ति पूर्ण विकसित हो जाती है।
किशोरावस्था में द्विवास्वपन एवं कल्पना शक्ति चर्म पर पहुँच जाती है।
नोटलड़को में कल्पना शक्ति अधिक होती है। एवं लड़कियों में रटन शक्ति अधिक होती है।
इस अवस्था में तर्क शक्ति के विकास के कारण किशोर तर्क के अभाव में किसी भी बात को स्वीकार नही करते।
किशोर भविष्य की योजनाये बनाना प्रारम्भ कर देते है।
12-15 वर्ष तक किशोर एवं किशोरियों में रूचि परिवर्तन होती रहती है 15-16 वर्ष के बाद किशोर विपरित लिंगी के प्रति अधिक आकर्षित होते है।
विशेष
किशोर के मानसिक विकास पर सर्वाधिक प्रभाव वंशानुक्रम का पड़ता है।

मानसिक विकास किशोर को वातावरण के साथ समायोजन की क्षमता प्रदान करता है।

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