Friday, 9 June 2017

बी.एफ. स्‍कीनर का क्रिया-प्रसूत अनुबन्‍धन का सिद्धान्‍त

बी.एफ. स्‍कीनर का क्रिया-प्रसूत अनुबन्‍धन का सिद्धान्‍त

बी. एफ. स्किनर
       इनका पूरा नाम बुरहस फ्रेडरिक स्किनर था। ये अमेरिकी मनोवैज्ञानी, व्यवहारवादी, लेखक, आविष्कारक और सामाजिक दार्शनिक थे। स्किनर को कट्टर व्‍यवहारवादी के रूप में जाना जाता है। इनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्‍त को क्रियाप्रसूत अनुबन्‍ध सिद्धान्‍त  कहते है। इस सिद्धान्‍त के लिए इन्‍होंने सफेद चूहों एवं कबूतर पर प्रयोग किये थे।

सिद्धान्त के अपर नाम
सक्रिय अनुबन्धन सिद्धान्त
अनुक्रिया उद्दीपन सिद्धान्त
क्रियाप्रसूत अनुबन्धन सिद्धान्त
कार्यात्मक प्रतिबद्धता सिद्धान्त
R.S Theory (Response Stimules Theory)
साधनात्मक अनुबन्ध
स्कीनर बक्स प्रयोग

स्‍किनर का प्रयोग
चूहे पर प्रयोग (1938)
       एक भूखे सफेद चूहे को स्‍कीनर बक्‍स में छोड़ दिया जाता था। बक्‍स ध्‍वनिरोधी था। बक्‍स की दीवार से निकलता हुआ एक लीवर था जिसका संबंध एक स्‍वचालित मशीन से होता था जिससे कि लीवर दबाने की अनुक्रिया की रिकार्डिंग अपने आप हो जाती थी। लीवर दबाने से अपने आप भोजन गोली के रूप में चूहे के सामने आ जाता था।
ऐसा देखा गया कि प्रयोग में चूहा पहले काफी समय तक बक्‍स में इधर-उधर घूमता रहा तथा दीवार एवं फर्श को सूँघता रहा और दीवार को दाँत से काटने की कोशिश करता रहा। फिर वह लीवर के पास आया। लीवर उससे सहसा दब गया जिसके परिणामस्‍वरूप से खाने के लिए गोलियां मिल गई। बाद के प्रयासों में वह बक्‍स में इधर - उधर घूमने, सूँघने आदि में नहीं के बराबर समय व्‍यतीत करता था और अन्‍त में एक ऐसा समय भी आया जिसमें बक्‍स में छोड़े जाने पर उसने सीधे लीवर दबाकर भोजन की गोलियां प्राप्‍त कीं और उसे खा लिया। इस तरह उसने बक्स में लीवर दबाने की अनुक्रिया को सीख लिया।

कबूतर पर प्रयोग (1943)—
                स्किनर ने चूहे के जैसा ही प्रयोग कबूतर के साथ भी किया। कबूतर को भी बक्स में बन्द करके, एक विशेष स्थान पर चोंच मारने पर भोजन की प्राप्ति होती थी।
                अन्य प्रयोग में कबूतरगोल रिंग में बंदभोजन प्राप्ति हेतु चक्कर लगाने रूपी अनुक्रियाभोजन (पुर्नबलन) की प्राप्ति, पुन: पुन: अनुक्रिया द्वारा चक्कर लगाकर भोजन प्राप्त करना सीखना।

                उक्त प्रयोगों के आधार पर स्कीनर ने शिक्षा जगत में पुनर्बलन को जन्म दिया। इनके अनुसार पुनर्बलन चार प्रकार का होता है
1. सतत पुनर्बलन,
2. निश्चित अन्तराल पुनर्बलन,
3. निश्चित अनुपात पुनर्बलन,
4. परिवर्तनशील पुनर्बलन।
शेपिंग
शेपिंग प्रविधि ऐसी प्रविधि है, जिसमें व्यक्ति का व्यवहार धीरे-धीरे किसी खास लक्ष्य की ओर पुनर्बलन के आधार पर ले जाया जाता है। शेपिंग प्रविधि को क्रमिक सन्निकटन की विधि भी कहा जाता है। स्कीनर ने शेपिंग प्रविधि द्वारा चूहों, कबूतरों एवं मनुष्यों को काफी जटिल कार्य करना भी सिखया था।

अभिक्रमित अनुदेश तीन प्रकार का होता है-
(i)     रेखीय अभिक्रमित अनुदेशनइसका प्रतिपादन स्कीनर ने किया एवं पुनर्बलन पर सर्वाधिक बल दिया।
रेखीय अभिक्रमित अनुदेशन को क्रिया प्रसूत भी कहा जाता है, इसीलिए इस सिद्धान्त को क्रिया प्रसूत 'अनुबन्धन सिद्धान्त, भी कहते है।
(ii)    शाखीय अभिक्रमित अनुदेशनइसका प्रतिपादन क्राउडर ने किया। इसमें निदान व उपचार पर बल दिया।
निदान का अर्थ समस्या को जानना व उपचार का अर्थ समस्या को हल करना।
(iii)    मैथैटिक्स अनुदेशनइसका प्रतिपादन गिलबर्ट ने किया एवं पाठ्य वस्तु के स्वामित्व पर बल दिया।

क्रियाप्रसूत अनुबन्ध के बारे में विशेष
स्किनर क्रियाओं पर जोर देते है, इसीलिए इसके सिद्धान्त को क्रियाप्रसूत सिद्धान्त कहते है।
स्किनर ने थार्नडाइक के S.R. (उद्दीपक प्रतिक्रिया) सिद्धान्त को R.S. (प्रतिक्रिया उद्दीपक) में बदल दिया।
स्किनर का मानना है कि क्रिया करते रहना चाहिए तथा क्रिया के तुरन्त बाद बालक को पुनर्बलन देना चाहिए। क्योंकि पुनर्बलन मिलने से क्रिया करने की गति में ओर तीव्रता आ जाती है।

क्रिया-प्रसूत अनुबन्ध का शैक्षिक महत्त्व
(1)          वांछित अनुक्रियाओं के पुनर्बलीकरण से बालकों को प्रोत्साहन मिलता है और वे उचित व्यवहार करने लगते है।
(2)          क्रिया के अनुसार सकारात्मक व नकारात्मक पुनर्बलन तुरन्त देना चाहिए क्योंकि देर करने से इसका प्रभाव कम हो जाता है।
(3)          इस सिद्धान्त के द्वारा बालक में अपेक्षित व्यवहारगत परिवर्तन किया जा सकता है।
(4)          इस सिद्धान्त में चूहे को भोजन का मिलना उसके लिए उचित पुर्नबलन है। इसी प्रकार प्रशंसा के दो शब्द एवं पुरस्कार आदि बच्चों की दृष्टि से उचित पुनर्बलन है।

(5)          अभिक्रमित अनुदेशन जिसे शिक्षण मशीन का नाम दिया गया है तथा जिसमें बालक स्वगति से सीखता है। इसी सिद्धान्त पर आधारित है।

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