Monday, 5 June 2017

थार्नडाइक का प्रयत्न तथा भूल का सिद्धान्त

थार्नडाइक का प्रयत्‍न तथा भूल का सिद्धान्‍त


उत्तेजक/उद्दीपक अनुक्रिया सिद्धान्त
                ई. एल. थार्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के सिद्धान्त को एक अति महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त माना गया है, जिसमें हमें साहचर्यवाद तथा विज्ञान की विधियों का अनोखा संगम दिखाई देता है। थार्नडाइक ने सीखने के सिद्धान्त का प्रतिपादन 1898 ई. में अपने पी-एच.डी. शोध प्रबन्ध जिसका शीर्षक 'एनिमल इण्टेलिजेंस' (Animal Intelligence) था, में पशु व्यवहारों के अध्ययन के फलस्वरूप किया।

उपनाम :-
1.  उद्दीपन-अनुक्रिया का सिद्धांत
2.  प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत
3.  संयोजनवाद का सिद्धांत
4.  अधिगम का बन्ध सिद्धांत
5.  प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत
6.  S-R थ्योरी

थार्नडाइक का प्रयोग :-
                थार्नडाइक ने अपना प्रयोग भूखी बिल्ली पर किया। बिल्ली को कुछ समय तक भूखा रखने के बाद एक पिंजरे(बॉक्स) में बन्ध कर दिया। जिसे  "पज़ल बॉक्स" (Pazzle Box) कहते हैं। पिंजरे के बाहर भोजन के रूप में थार्नडाइक ने मछली का टुकड़ा रख दिया। पिंजरे के अन्दर एक लिवर(बटन) लगा हुआ था जिसे दबाने से पिंजरे का दरवाज़ा खुल जाता था। भूखी बिल्ली ने भोजन (मछली का टुकड़ा) को प्राप्त करने व पिंजरे से बाहर निकलने के लिए अनेक त्रुटिपूर्ण प्रयास किए। बिल्ली के लिए भोजन उद्दीपक का काम कर  रहा था ओर उद्दीपक के कारण बिल्ली प्रतिक्रिया कर रही थी।
बिल्‍ली ने अनेक प्रकार से बाहर निकलने का प्रयत्न किया। एक बार संयोग से उसके पंजे से लिवर दब गया। लिवर दबने से पिंजरे का दरवाज़ा खुल गया और भूखी बिल्ली ने पिंजरे से बाहर निकलकर भोजन को खाकर अपनी भूख को शान्त किया। थार्नडाइक ने इस प्रयोग को बार- बार दोहराया तथा देखा कि प्रत्येक बार बिल्ली को बाहर  निकलने में पिछली बार से कम समय लगा ओर  कुछ समय बाद बिल्ली बिना किसी भी प्रकार की भूल के एक ही प्रयास में पिंजरे का दरवाज़ा खोलना सीख गई। इस प्रकार उद्दीपक ओर अनुक्रिया में  सम्बन्ध स्थापित हो गया।

उपर्युक्त प्रयोग में बिल्ली द्वारा अपनाये गये चरण
1. चालकभूख
2. लक्ष्यमछली
3. लक्ष्य प्राप्ति में बाधा-पिंजरे का बन्द दरवाजा
4. उल्टे-सीधे प्रयत्नपिंजरे को काटना इत्यादि
5. संयोग व सफलतालीवर का दबना, दरवाजे का खुलना
6. सही प्रयत्न का चुनावदरवाजा खोलने का तरीका
7. स्थिरतादरवाजा खोलना।
इस सिद्धान्त के अनुसार थार्नडाइक ने सीखने के नियम दिये हैं, जिन्हें दो भागों में विभक्त किया गया है
(1) मुख्य नियम
(2) गौण नियम

थार्नडाइक के मुख्य नियमों का स्पष्टीकरण

मुख्य नियम :-
1.  तत्परता का नियम :- यह नियम कार्य करने से पूर्व तत्पर या तैयार किए जाने पर बल देता है। यदि हम किसी कार्य को सीखने के लिए तत्पर या तैयार होता है, तो उसे शीघ्र ही सीख लेता है। तत्परता में कार्य करने की इच्छा निहित होती है। ध्यान केंद्रित करने मेँ भी तत्परता सहायता करती है।
जैसेएक घोडे को तालाब तक तो ले जा सकते है लेकिन उसे पानी पीने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।

2.  अभ्यास का नियम :- यह नियम किसी कार्य या सीखी गई विषय वस्तु के बार-बार अभ्यास करने पर बल देता है। यदि हम किसी कार्य का अभ्यास करते रहते है, तो उसे सरलतापूर्वक करना सीख जाते है। यदि हम सीखे हुए कार्य का अभ्यास नही करते है, तो उसको भूल जाते है।
इस नियम के दो उपनियम होते हैं
                (i)     उपयोग का नियमयह नियम पुनरावृत्ति पर आधारित होता है।
                (ii)     अनुपयोग का नियमयह नियम विस्मृति पर आधारित होता है।
जैसे—     करत करत अभ्यास के, जडमती होत सुजान।
                रसरी आवत जात ते, सिल पर पडत निशान॥

       3.  प्रभाव (परिणाम) का नियम :- इस नियम को सन्तोष तथा असन्तोष का नियम भी कहते है। इस नियम के अनुसार जिस कार्य को करने से प्राणी को सुख व सन्तोष मिलता है, उस कार्य को वह बार-बार करना चाहता है और इसके विपरीत जिस कार्य को करने से दुःख या असन्तोष मिलता है, उस कार्य को वह दोबारा नही करना चाहता है।

थार्नडाइक के गौण नियम नियमों का स्पष्टीकरण
1.  बहु-प्रतिक्रिया का नियम :-
                इस नियम के अनुसार जब प्राणी के सामने कोई परिस्थिति या समस्या उत्पन्न हो जाती है तो उसका समाधान करने के लिए वह अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएं करता है,और इन प्रतिक्रियाएं को करने का क्रम तब तक जारी रहता है जब तक कि सही प्रतिक्रिया द्वारा समस्या का समाधान या हल प्राप्त नहीं हो जाता है। प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत इसी नियम पर आधारित हैं।
2.  मनोवृत्ति का नियम :-
                इस नियम को मानसिक विन्यास का नियम भी कहते है। इस नियम के अनुसार जिस कार्य के प्रति हमारी जैसी अभिवृति या मनोवृति होती है, उसी अनुपात में हम उसको सीखते हैं। यदि हम मानसिक रूप से किसी कार्य को करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो या तो हम उसे करने में असफल होते हैं, या अनेक त्रुटियाँ करते हैं या बहुत विलम्ब से करते हैं।
3.  आंशिक क्रिया का नियम :-
                इस नियम के अनुसार किसी कार्य को छोटे-छोटे भागों में विभाजित करने से कार्य सरल और सुविधानक बन जाता है। इन भागों को शीघ्रता और सुगमता से करके सम्पूर्ण कार्य को पूरा किया जाता है। इस नियम पर 'अंश से पूर्ण की ओर' का शिक्षण का सिद्धांत आधारित किया जाता है।
4.  सादृश्यता अनुक्रिया का नियम :-
                इस नियम को आत्मीकरण या समानता का नियम भी कहते है। यह नियम पूर्व अनुभव पर आधारित है। जब प्राणी के सामने कोई नवीन परिस्थिति या समस्या उत्पन्न होती है तो वह उससे मिलती-जुलती परिस्थिति या समस्या का स्मरण करता है, जिसका वह पूर्व में अनुभव कर चुका है। वह नवीन ज्ञान को अपने पर्व ज्ञान का स्थायी अंग बना लेते हैं।
5.  साहचर्य परिवर्तन का नियम :-
       इस नियम के अनुसार एक उद्दीपक के प्रति होने वाली अनुक्रिया बाद में किसी दूसरे उद्दीपक से भी होने लगती है। दूसरे शब्दों में, पहले कभी की गई क्रिया को उसी के समान दूसरी परिस्थिति  में उसी प्रकार से करना। इसमें क्रिया का स्वरूप तो वही रहता है, परन्तु परिस्थिति में परिवर्तन हो जाता है। थार्नडाइक ने पावलव के शास्त्रीय अनुबन्धन को ही साहचर्य परिवर्तन के नियम के रूप में व्यक्त किया।

शैक्षिक महत्त्व
                (1) अनुभव से लाभ उठाना।
                (2) निरन्तर प्रयास पर बल।
                (3) अभ्यास की क्रिया पर आधारित।
                (4) असफलता में सफलता।
                (5) निराशा में आशा।
                (6) आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता।
                (7) करके सीखना।
                (8) छोटे बालकों के सीखने के लिए विशेष उपयोगी।


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