Thursday, 22 June 2017

अभिवृद्धि एवं विकास

अभिवृद्धि एवं विकास
विकास (Development) — 
                विकास की प्रक्रिया गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक किसी न किसी रूप में चलती रहती है इसकी गति कभी तीव्र और कभी मंद होती है। मानव विकास का अध्ययन प्राकृतिक विज्ञानों में भी होता है और मनोविज्ञान में भी होता है। व्यक्ति की जन्मपूर्व अवस्था से परिपक्व अवस्था तक हाने वाले सभी परिवर्तनों को स्पष्ट किया जाता है।
                ''अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग सामान्यत: शरीर और उसके अंगों के भार तथा आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है। इस वृद्धि को नापा, तौला जा सकता है। विकास का सम्बन्ध अभिवृद्धि से अवश्य होता है पर यह शरीर के अंगों में होने वाले परिवर्तनों को विशेष रूप से व्यक्त करता है।'' → सौरेन्सन
                विकास एक बहुमुखी प्रक्रिया है इसमें शारीरिक विकास के अतिरिक्त, सामाजिक विकास, मानसिक, आध्यात्मिक विकास तथा संवेगात्मक अवस्था में होने वाले परिवर्तनों को भी शामिल किया जाता है।
                हरलॉक के अनुसार-इन्होने अभिवृद्धि को मात्रात्मक परिवर्तन तथा विकास गुणात्मक परिवर्तन कहा है।
अभिवृद्धि एवं विकास में अन्तर

अभिवृद्धि और विकास के सिद्धान्त
                1. निरन्तरता का सिद्धान्त       
                2. विभिन्न गति का सिद्धान्त
                3. विकास की दिशा का सिद्धान्त  
                4. विकास क्रम का सिद्धान्त
                5. एकीकरण का सिद्धान्त
                6. परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त
                7. समान प्रतिमान का सिद्धान्त   
                8. सामान्य से विशिष्ट प्रक्रिया का सिद्धान्त
                9. वंशानुक्रम व वातावरण का सिद्धान्त    
                10. विकास का लम्बवत न होकर वर्तुलाकार सिद्धान्त
अभिवृद्धि व विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(1) जैविक /वंशानुक्रम संबंधि कारक
                शारीरिक संरचनाशारीरिक कारण व्यक्ति के विकास में शरीर रचना का विशेष महत्व है। व्यक्ति की शारीरिक सुन्दरता, आकर्षण, स्वास्थय आदि उत्तम व्यक्ति का निर्माण करते है तथा श्रेष्ठ भावों को जन्म देते है। जिससे-व्यक्ति का विकास होता रहता है।
(2) अन्त: स्त्रावी ग्रन्थियाँ
                प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर कुछ अन्त: स्त्रावी ग्रन्थिया होती है, जिनमें आन्तरिक स्त्राव चलता रहता है। यह आन्तरिक स्त्राव एक प्रकार का रस होता है। इस रस को हार्मोन्स कहा जाता है। यह हार्मोन्स रक्त में मिलकर शरीर के विभिन्न अंगो तक पहुँचता है। और उन अंगो की कार्यप्रणाली को गतिशील रखता है इस गतिशीलता  के प्रभाव में कम या ज्यादा हो जाना सम्बन्धित व्यक्ति के विकास को प्रभावित करता है।
(i)     गलग्रन्थि
(ii)     उपवृक्क ग्रन्थि
(iii)    पोष ग्रन्थि
(iv)         योनग्रन्थि
(v)          स्नायुमण्डल
(3) बुद्धि
                व्यक्ति के निर्धारण में बुद्धि का प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ता है। तीव्र बुद्धि वाले व्यक्ति का सामान्य अथवा मन्द बुद्धि वाले व्यक्ति की अपेक्षा भिन्न होता है।
(4)          वातावरणीय कारक
(i)     भौतिक कारक
(ii)     पारिवारिक कारक
(iii)    विद्यालयी वातावरणीय कारक
(iv)         मनोवैज्ञानिक वातावरण
(v)          सामाजिक वातावरण
(vi)    सांस्कृतिक वातावरण
(5)          जन संचार माध्यम का प्रभाव
                जन संचार के साधनो का जैसेसमाचार पत्र-पत्रिकाएँ, पुस्तके, रेडियो, T.V., सिनेमा, इन्टरनेट, मोबाइल इत्यादि सूचना तथा मनोरंजन के साधनो का मानव विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता नजर आ रहा है। जिससे मानव विकास प्रभावित होता है।
विकास की अवस्थायें
                विभिन्‍न मनोवैज्ञानिकों ने बालक की अवस्थाओं को विभाजित करने का प्रयत्न किया है जो इस प्रकार है -
(अ) रोस के अनुसार :-
(1) शैशवकाल                 1 से 3 वर्ष तक
(2) पूर्व-बाल्यावस्था                 3 से 6 वर्ष तक
(3) उत्तर- बाल्यावस्था           6 से 12 वर्ष तक
(4) किशोरावस्था              12 से 18 वर्ष तक
(ब) जोन्स के अनुसार :-
(1) शैशवावस्था                      जन्म से 5 वर्ष की आयु तक
(2) बाल्यावस्था                       5 वर्ष से 12 वर्ष की आयु तक
(3) किशोरावस्था                    12 वर्ष से 18 वर्ष की आयु तक
(स) हरलोक के अनुसार :-
(1) गर्भावस्था                      गर्भधारण से जन्म तक
(2) नवजात अवस्था                 जन्म से 15 दिन तक
(3) शैशवावस्था                      15 दिन से 2 वर्ष की आयु तक
(4) बाल्यावस्था                      2 वर्ष से 11 वर्ष की आयु तक
(5) किशोरावस्था                  11 वर्ष से 21 वर्ष की आयु तक
विकास की अवस्‍थाओं का सामान्य वर्गीकरण
1. पूर्वप्रसूतिकाल (Prenatal period) - यह अवस्‍था गर्भधारण से प्रारंभ होकर जन्‍म तक की होती है।
2. शैशवावस्‍था (Infancy) - यह अवस्‍था जन्‍म से प्रथम दो तीन सप्‍ताह तक होता है।
3. बचपनावस्‍था (Babyhood) - यह अवस्‍था जन्‍म के तीन सप्‍ताह से 2 वर्ष तक की होती है।
4. बाल्‍यावस्‍था (Childhood) - यह अवस्‍था 2 साल से प्रारंभ होकर 10 या 12 वर्ष तक की होती है। इसे दो भागों में बांटा गया है-
I. प्रारंभिक बाल्‍यावस्‍था या पूर्व बाल्‍यावस्‍था (Early Childhood) - 2 साल से प्रारंभ होकर 5 या 6 साल तक होती है।
II. उत्तर बाल्‍यावस्‍था (Later Childhood) - यह अवस्‍था 6 साल से प्रारंभ होकर 10 या 12 वर्ष तक होती है।
5. किशोरावस्‍था (Adolescence) - यह अवस्‍था 12 से 18 साल तक होती है।
6. प्रौढ़ावस्‍था (Maturity) - यह अवस्‍था 18 साल के बाद की अवस्‍था होती है।

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