Wednesday, 14 June 2017

संज्ञानात्‍मक विकास का सिद्धान्‍त

संज्ञानात्‍मक विकास का सिद्धान्‍त
प्रवर्तकजीन पियाजे (1896-1980)
जीन पियाजे स्विट्जरलैण्ड के मनोवैज्ञानिक थे।
पियाजे ने बच्चों के सीखने के तरीकों पर सबसे पहले अध्ययन किया।
विकासात्मक बाल मनोविज्ञान का जनकजीन पियाजे माने जाते हैं।
जीन पियाजे मानव विकास के तीनों पक्षों (1. ज्ञानात्मक पक्ष, 2. भावात्मक पक्ष एवं 3. क्रियात्मक पक्ष) में से ज्ञानात्मक पक्ष पर सर्वाधिक बल दिया एवं संज्ञानात्मक विकासवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार अवस्थाओं में विभाजित किया है-
(1) संवेदिक पेशीय अवस्था (Sensory Motor) : जन्म के 2 वर्ष
(2) पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational) : 2-7 वर्ष
(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational) : 7 से 11 वर्ष
(4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational) : 11 से 16 वर्ष

(1) संवेदी पेशीय अवस्था/इन्द्रिय जनित अवस्था/संवेदी गत्यात्मक अवस्था—0 से 2 वर्ष
इस अवस्था में बालक ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से किसी भी विषय का अधिगम करता है।
इस अवस्था में देखकर, सुनकर, सुंघकर, स्पर्शद्वारा, चखकर ज्ञानेन्द्रियों द्वारा किसी भी विषय का अधिगम किया जाता है।
चूँकि इस अवस्था में बालक की संवेदनाएँ विकसित होती है। अत: इस अवस्था संवेदी पेशीय अवस्था कहते हैं।
इस अवस्था के अन्त में 22 - 23 माह की अवस्था में जब बच्चें का खिलौना छिपाया जाता है, तो वह इसे ढूंढने का प्रयत्न अवश्य करता है। इस प्रयास को वस्तु स्मेतर्य कहते है।

(2) पूर्व संक्रिया अवस्था—2 से 7 वर्ष
इस अवस्था में बालक का सजीव चिन्तन विकसित हो जाता है। बालक की भाषा का उचित विकास हो जाता है एवं सम्प्रत्यय निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है।
बालक ज्ञानेन्द्रियों के अतिरिक्त भी अधिगम करता है एवं दो वस्तुओं के बीच अन्तर पहचानना प्रारम्भ कर देता है।

(3) मूर्त संक्रिया अवस्था—7 से 11 वर्ष
इस अवस्था में बालक किसी भी विषय को देखकर विचार बनता हैं एवं दो वस्तुओं के बीच अन्तर करना, गणना करना, तुलना डरना, समानता असमानता बताना सीख जाता है।
इस अवस्था में बालक में पलटकर सोचने की योग्यता अर्थात् अनुत्क्रमणीयता विकसित हो जाती है।
इस अवस्था को स्थूल संक्रियात्मक अवस्था भी कहते हैं।

(4) औपचारिक संक्रिया अवस्था—11 से 16 वर्ष
यह संज्ञानात्मक विकास की अन्तिम अवस्था है एवं इस अवस्था में बालक में सम्प्रत्यय निर्माण की योग्यता का पूर्ण विकास हो जाता हैं।
बालक की बुद्धि तर्क-वितर्क करने लगती हैं।
कठिन सवालों को हल करने लगती हैं एवं अमूर्त चिन्तन करने की क्षमता बालक में उत्पन्न हो जाती है। अत: इसे अमूर्त चिन्तन की अवस्था भी कहते हैं।    

विशेष तथ्य
जीन पियाजे ने बालकेन्द्रित शिक्षा का समर्थन किया।
जीन पियाजे ने शिक्षक की भूमिका को महत्त्वूपर्ण बताया।
जीन पियाजे ने उचित अधिगम वातावरण का निर्माण करने पर बल दिया।
जीन पियाजे ने मनोविज्ञान में जीव विज्ञान के शब्द स्कीमा का प्रयोग किया जिसका अर्थ है, किसी भी क्रिया के समान्तर की जाने वाले मानसिक प्रक्रिया।

स्कीमा को मनोविज्ञान में उद्दीपन अनुक्रिया कहते हैं।

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