Tuesday, 23 May 2017

शिक्षा मनोविज्ञान के अध्‍ययन की विधियाँ

शिक्षा मनोविज्ञान के अध्‍ययन की विधियाँ

अपने उद्देश्‍य की पूर्ति के लिए शिक्षा मनोवैज्ञानिक अपनी विभिन्‍न विधियों द्वारा शिक्षार्थियों के व्‍यवहारों से संबंधित समस्‍याओं का अध्‍ययन करने के लिए आँकड़ों का संग्रह करता है, तथा आँकड़ों का विश्‍लेषण कर निष्‍कर्ष निकालता है। इन विधियों का विवरण निम्‍नानुसार है
उपचारात्मक विधि
(1) व्यक्ति के आचरण व जटिलताओं को दूर करने का प्रयास किया जाता है।
(2) आवश्यकता पूर्ति नही होने का कारण ढूँढना व जटिलताओं का अध्ययन करना।
उपचारात्मक विधि के गुण
व्यक्ति सहायक विधि होती है।
कुसमायोजन का उपचार किया जा सकता है।
बालक का तुतलाकर बोलना, संवेगों का विकास नही होना।
जटिल समस्याओं का समाधान।
दोष—   
जटिलताओं का अध्ययन करना आसान नहीं होता।
सुनिश्चित मापन का अभाव होता है।
व्यक्तिनिष्ठ विधि होती है।

प्रयोगात्मक विधि
(1) पूर्व निर्धारित दशाओं में मानव व्यवहार का अध्ययन।
(2) व्यक्तिनिष्ठ विधि होती है। विलियम वुण्टसर्वप्रथम 1879 ईस्वी. में मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला स्थापित की थी, लिपजिंग में की थी।
(3) प्राक्कल्पना का निर्माण किया जाता है।
(4) चरों व घटनाओं के साथ पता लगाया जाता है।
प्रयोगात्मक विधि के लाभ
(1) निश्चित परिणाम तक पहुँचाती है।
(2) नियन्त्रित परिस्थितियों में परिणाम वस्तुनिष्ठ होता है।
दोष
(1) परिस्थितियाँ कृत्रिम हो सकती है।
(2) मानसिक दशाओं में तथ्य पूर्णत: प्राप्त नहीं होते।

तुलनात्मक विधि
व्यवहार से सम्बन्धित समानताओं व असमानताओं का तुलनात्मक अध्ययन होता है। इस विधि का प्रयोग सीखने की प्रक्रिया पर प्रबल जोर दिया गया है। इस विधि का प्रयोग कक्षा-कक्ष में चल ही शिक्षण प्रक्रिया को जाँचने-परखने के लिए किया जाता है।

मनोविश्लेषणात्मक विधि
वियाना के चिकित्सक (वियतनाम में जन्म स्थान) सिगमन फ्राइड इस विधि के जन्मदाता माने जाते है। इस विधि में व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं का पता लगाया जाता है। यह मानसिक क्रियाएँ, मानसिक ग्रन्थियों से आबद्ध रहती है। इन मानसिक ग्रन्थियों के आधार पर मन को (मानसिक अवस्थाओं को) तीन प्रकार का बताया गया है
(1) चेतन,  (2) अर्द्धचेतन, (3) अचेतन।

मनो-भौतिकी विधि
यह मन तथा शरीर पर पडऩे वाले प्रभावों का अध्ययन है।

प्रश्नावली विधि
समस्या से सम्बन्धित प्रश्नों की प्रश्नावली बनाकर प्रस्तुत किया जाता है तथा बाद में व्यक्ति के पास उस समस्या का, उस व्यक्ति के पास हल भेजा जाता है। यह विधि चार प्रकार की होती है।
(1) खुली प्रश्नावली (मुक्त प्रश्नावली)        (2) बन्द प्रश्नावली
(3) सचित्र प्रश्नावली                    (4) मिश्रित प्रश्नावली

साक्षात्कार विधि
विचार विमर्श व जानकारी प्राप्त प्रश्नोत्तरों या वार्तालाप के माध्यम से समस्याओं का हल करना व सत्य के निकट पहुँचना साक्षात्कार कहलाता है। यह व्यक्ति के संवेदनाओं को जानने की सर्वोत्तम विधि है।

समाजमिति पद्धति
इसके प्रवर्तक-मोरेनो है। यह सामाजिक 'समूह की बनावट का अध्ययन' करने तथा उस समूह में प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति का मापन करने हेतु प्रयुक्त होती है।

जीवन इतिहास विधि
इस विधि द्वारा जीवन का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाता है, जिसे केस स्टडी विधि भी कहते है। इस विधि का सर्वप्रथम उपयोग टाइड मैन ने किया था। जैसे— (अ) परिजनों, (ब) मित्रों, व्यवहार के बारे में जानकारी देते है,
(स) इसमें व्यक्ति की आवश्यकताओं व कारणों का निदान भी किया जाता है।
जीवन इतिहास विधि के गुण
अध्ययन व निदान दोनों सम्भव है।
व्यक्ति के बारे में सूचना प्राप्त कर सकते है।
जीवन इतिहास विधि के दोष
निष्कर्ष व्यक्ति की अवश्यकता होती है।
व्यवहार परिवर्तनशील है, अध्ययन करना सरल नही होता।

विकासात्मक विधि
इसमें विकास कि क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। गर्भावस्था से मृत्युपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। इस विधि को उत्पत्ति मूल विधि भी कहा जाता है।
गुण(1) यह व्यापक होती है।
(2) निश्चित प्रश्नों के उत्तर सरलता से मिल जाते हैं।
(3) शारीरिक, सामाजिक एवं मानसिक विकास का अध्ययन इस विधि का सर्वोत्तम गुण है।

निरीक्षण विधि
निरीक्षणयह मनोविज्ञान की प्राचीनतम विधि है। इस विधि को दो भागों में बाँटा जा सकता हैअन्तरनिरीक्षण, बाह्य निरीक्षण।
अन्तरनिरीक्षण इस विधि में मनोवैज्ञानिक या कोई व्यक्ति स्वयं अपना निरीक्षण कर समय-समय पर उत्पन्न होने वाले विचारों, भावों, भावनाओं, कल्पनाओं आदि का निरीक्षण, विश्लेषण करता है।

अन्तर्निरीक्षण
अन्‍तर्निरीक्षण विधि संरचनावादियों की विधि थी। इस विधि का उपयोग उण्‍ट, टिचेनर, स्‍काउट एवं विलियम जेम्‍स आदि मनोवैज्ञानिकों द्वारा चेतन अनुभूति के तत्त्वों के अध्‍ययन हेतु किया गया था। 
1. मौखिक विधि है।
2. यंत्र आदि की आवश्यकता नही होती।
3. मानसिक अवस्थाओं व क्रियाओं का विश्लेषण करती है।
4. सबसे प्राचीन विधि है।
जॉन लॉकआत्मनिरीक्षण में मस्तिष्क द्वारा अपनी क्रियाओं का स्वयं निरीक्षण किया जाता है।

बाह्य निरीक्षण/दर्शन
इसके जनक जे.बी. वाटसन माने जाते है। इसमें बाह्य रूप से व्यक्ति का निरीक्षण किया जाता है। इस विधि को अन्य नामों से भी जाना जाता है। जैसेअवलोकन, निरीक्षण, प्रेक्षण, बहिर्दर्शन इत्यादि।
(1) प्राणियों के व्यवहार का अध्ययन किसी विशेष परिस्थितियों में किया जाता है।
(2) सामाजिक सम्बन्ध जन्म-जात गुण, समूह आदि के रूपों में निरीक्षण होता है।

सांख्यिकी विधि
घटनाओं का अनुभव करना, अनुमान करना, संकलित तथ्यों का विवेचन सांख्यिकी विधि द्वारा किया जाता है। यह विधि आधुनिक व अत्यधिक प्रचलित विधि है। पूर्वानुमान लगाने में सहायक है।

परीक्षण विधि
यह विधि प्रायोगिक विधि के अन्तर्गत आती है। इस विधि को अनुसंधान की सर्वोत्तम विधि के रूप में स्वीकार किया गया है। इस विधि में प्रयोगकत्र्ता पहले अपने अनुसार परिस्थितियों या वातावरण निर्धारण करता है।
गुण
(1) शैक्षिक समस्याओं का निराकरण इस विधि से किया जाता है।
(2) यथार्थ निरक्षण, परीक्षण दोहराकर यथार्थ को निश्चित करना, इस विधि का महत्त्वपूर्ण गुण है। उद्दीपन, प्राणी व अनुक्रिया के बीच सम्बन्ध स्थापित करने में सहायक है।
दोष  (1) यह खर्चीली है।
       (2) स्वतंत्र पद्धति नहीं है।
      (3) मानसिक व आन्तरिक दशाओं का पता लगाना असम्भव है।

रेटिंग स्केल/मापन रेखापद्धति
इसमें किसी व्यक्ति के विशेष गुणों का मूल्यांकन उसके सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों से करवाया जाता है। 'फाइव पाइंट रेटिंग स्केल'सदैव, बहुधा, कभी-कभी, साधारणतया, कभी नहीं।

सह-संबंधात्‍मक या विभेदी विधि
सह-संबंधात्‍मक या विभेदी विधि द्वारा अध्‍ययन करने के लिए वे दो तरह के बालकों का चयन करेंगे-अपराधी बालकों का एक समूह तथा सामान्‍य बालकों का दूसरा समूह तैयार किया जाएगा। इसके बाद इनका विभिन्‍न विधियों द्वारा अध्‍ययन करके  निश्चित किया जाएगा कि अपराधी बालकों में कितने बालक लाभान्वित परिवार से आते हैं तथा कितने बालक अलाभान्वित परिवार से आते हैं। ठीक इसी प्रकार सामान्‍य बालकों के बारे में पता किया जायेगा। इनका ब्‍यौरा तैयार कर लेने के बाद उपयुक्‍त सांख्यिकीय विधि द्वारा आँकड़ों का विश्‍लेषण कर शिक्षा मनोवैज्ञानिक  इस निष्‍कर्ष पर पहुँच सकता है कि अलाभान्वित परिवार के बालकों में लाभान्वित परिवार के बालकों की अपेक्षा अपराधीकरण की प्रवृत्ति अधिक होती है।

कोटि विधि

शिक्षा मनोविज्ञान में कोटि विधि का प्रयोग कुछ खास-खास परिस्थितियों में, जैसे बालकों के आत्‍मनिष्‍ठ शीलगुणों का अध्‍ययन करने में किया जाता है।
रिली तथा लेविस के अनुसार कोटि विधि का प्रयोग कुछ आत्‍मनिष्‍ठ शीलगुण जैसे ईमानदारी तथा अन्‍य नैतिक एवं चारित्रिक शीलगों के अध्‍ययन में एक असमानान्‍तर विधि के रूप में की जाती है।
इस विधि में शिक्षक बालकों को या शिक्षार्थियों को दिए गए शीलगुणों के आधार पर उच्‍च कोटि से निम्‍न कोटि की दिशा में श्रेणीकरण करते हैं। जैसे शिक्षक बालकों की ईमानदारी के शीलगुण पर श्रेणीकरण करते हुए कोटि 1, 2, 3, ..... आदि के रूप में श्रेणीकरण कर सकते है।
कोटि-1 में अधिकतम ईमानदारी दिखानेवाले बालक को
कोटि-2 में उससे कम ईमानदारी दिखानेवाले बालक को
कोटि-3 में उससे कम ईमानदारी दिखानेवाले बालक को
इसी तरह से सबसे अंतिम कोटि में उस छात्र को रखा जा सकता है जिसमें ईमानदारी का गुण सबसे कम हो। 



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